चंद्रिपुरा वायरस के दो साल बाद गुजरात में फिर से प्रकोप के कारण तीन छोटे बच्चों की मौतें हुईं। राज्य ने त्वरित नियंत्रण अभियान शुरू किया है, जबकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह रोग घंटों में जान ले सकता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- चंद्रिपुरा वायरस ने गुजरात में तीन बच्चों की मौतों के साथ पुनः प्रकोप किया है।
- रोग का प्रसार मुख्यतः संक्रमित रेत की मच्छरों के काटने से होता है, और यह तेज़ी से न्यूरोलॉजिकल जटिलताएँ पैदा करता है।
- वर्तमान में कोई विशेष वैक्सीन या एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए रोकथाम और शीघ्र चिकित्सा हस्तक्षेप प्रमुख हैं।
गुजरात में चंद्रिपुरा वायरस का प्रकोप दो साल पहले हुए सबसे घातक घटना के बाद फिर से सामने आया है। इस बार तीन बच्चों की जान चली गई, जिनमें से एक राजस्थान से आया ६‑वर्षीय था, जिसे हिम्मतनगर सिविल अस्पताल में उपचार के दौरान पुष्टि हुई। पंछमारहॉल जिले में भी तीन‑चार साल के दो शिशुओं की मौतें दर्ज की गईं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि संक्रमण अब एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा।
रोग का इतिहास और वैश्विक संदर्भ
चंद्रिपुरा वायरस, जिसे वैक्सिलोवायरस के नाम से भी जाना जाता है, पहली बार 1965 में महाराष्ट्र के चंद्रिपुरा गांव में पहचाना गया था। तब से यह मुख्यतः पश्चिमी और केंद्रीय भारत के कुछ हिस्सों में पाया गया है। यह रैबडोविरिडे परिवार से संबंधित है और इसकी मृत्यु दर 55% से 85% तक हो सकती है, खासकर बच्चों में। 2024 के बड़े प्रकोप में, जब गुजरात में एक्यूट एन्सेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम (AES) के मामलों की संख्या बढ़ी, तो चंद्रिपुरा वायरस को प्रमुख कारण के रूप में पुष्टि की गई।
लक्षण, निदान और उपचार
रोग की शुरुआत आम तौर पर तेज़ बुखार, सिरदर्द, उल्टी और कमजोरी के रूप में होती है, जिसके बाद न्यूरोलॉजिकल लक्षण जैसे दौरे, चेतना में परिवर्तन और गंभीर मस्तिष्क सूजन दिखाई देती है। डॉक्टर कहते हैं कि लक्षणों के 24–48 घंटे के भीतर ही यह जानलेवा बन सकता है। निदान के लिए रक्त और सेरेब्रोस्पाइनल द्रव के परीक्षण आवश्यक हैं, जबकि उपचार में मुख्यतः सहायक देखभाल—बुखार नियंत्रित करना, दौरे रोकना और मस्तिष्क सूजन को कम करना—शामिल है।
रोकथाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया
वर्तमान में इस वायरस के लिए कोई वैक्सीन या विशिष्ट एंटीवायरल उपलब्ध नहीं है, जिससे रोकथाम सबसे प्रभावी रणनीति बन जाती है। स्वास्थ्य विभाग ने हजारों चिकित्सा टीमों को तैनात कर घर‑घर जाकर निगरानी, कीटनाशक छिड़काव और प्रभावित क्षेत्रों में स्क्रीनिंग शुरू कर दी है। माता‑पिता को सलाह दी जा रही है कि यदि उनके बच्चों में अचानक तेज़ बुखार, उल्टी या न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल जाएँ। साथ ही, घर के आसपास साफ‑सुथरा रखना, जल जमाव को रोकना और कीट-निवारक उपाय अपनाना अनिवार्य है।
भविष्य की चुनौतियाँ और संभावित समाधान
चंद्रिपुरा वायरस का प्रसार मुख्यतः रेत की मच्छरों के काटने से होता है, हालांकि कुछ अध्ययन टिक्स और मच्छरों के संभावित भूमिका का भी संकेत देते हैं। शोधकर्ताओं को एक वैक्सीन विकसित करने के लिए प्रेरित किया गया है, लेकिन समय और वित्तीय संसाधन सीमित हैं। इस बीच, सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना, समय पर रिपोर्टिंग और मजबूत वेक्टर‑नियंत्रण उपायों को लागू करना प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए सबसे व्यावहारिक कदम हैं।