बेंगलुरु ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अनार की खेती में जबरदस्त उछाल आया है। बाजार में बढ़ती मांग और उच्च कीमतों के कारण किसान अब इस फल की ओर रुख कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बेंगलुरु ग्रामीण में अनार की खेती का क्षेत्र 180 हेक्टेयर से बढ़कर 1,154 हेक्टेयर हो गया है।
- बाजार में प्रीमियम गुणवत्ता वाले अनार की कीमत ₹250 से ₹300 प्रति किलो तक मिल रही है।
- अनार की खेती अब उत्तर कर्नाटक के पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर बेंगलुरु के नेलमंगला और येलहंका जैसे क्षेत्रों में फैल गई है।
- बैक्टेरियल ब्लाइट (मच्चे रोग) किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
कर्नाटक के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रूप से अनार की खेती के लिए जाने जाने वाले उत्तर कर्नाटक के जिलों—बागलकोट, विजयपुरा और कोप्पल—के अलावा, अब बेंगलुरु के किसान भी इस फल की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। बाजार में अनार की बढ़ती मांग और इसके आकर्षक दाम ने किसानों को इस नई फसल को अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि
बागवानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बेंगलुरु ग्रामीण क्षेत्र में अनार की खेती का दायरा 2020-21 में मात्र 180 हेक्टेयर था, जो 2024-25 में बढ़कर 1,154 हेक्टेयर हो गया है। इसके साथ ही, उत्पादन भी 1,663 मीट्रिक टन से बढ़कर 12,692 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। बेंगलुरु शहरी क्षेत्र में भी उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
बेंगलुरु के अनार की खासियत
स्थानीय किसानों का कहना है कि बेंगलुरु की अर्ध-शुष्क जलवायु और लाल मिट्टी अनार की खेती के लिए बेहद उपयुक्त है। राजनकुंते के किसान मुनिरुजू ब्याथा के अनुसार, बेंगलुरु में उगाए जाने वाले अनार का आकार और रंग बागलकोट या महाराष्ट्र के अनार की तुलना में अधिक बड़ा और चमकदार होता है। यह फसल कम पानी की खपत करती है और नई मिट्टी में भी तेजी से अनुकूलित हो जाती है।
चुनौतियां और कृषि पर्यटन
जहाँ एक ओर यह फसल मुनाफे का सौदा साबित हो रही है, वहीं 'मच्चे रोग' (Bacterial Blight) किसानों के लिए एक गंभीर खतरा है। बागवानी विभाग के संयुक्त निदेशक कृष्णमूर्ति ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक उर्वरक और पानी का उपयोग इस बीमारी को बढ़ावा दे सकता है, जिससे पैदावार में 50% से 100% तक की कमी आ सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ किसान 'फार्म टूरिज्म' (Farm Tourism) जैसे नए मॉडल भी अपना रहे हैं, जहाँ शहरी लोग सीधे खेतों में आकर ताजे फल तोड़ सकते हैं। यह न केवल आय का एक अतिरिक्त स्रोत है, बल्कि शहरी और ग्रामीण समुदायों के बीच एक सेतु का काम भी कर रहा है।