सेबी ने गैर‑बैंकिंग, गैर‑बीमा पीएसयू की स्वैच्छिक डीलिस्टिंग के लिए नया फिक्स्ड‑प्राइस फ्रेमवर्क पेश किया है। इस नियम के अंतर्गत ऑफ़र प्राइस को फ्लोर प्राइस से कम से कम 15 % ऊपर रखना अनिवार्य है, जिससे छोटे निवेशकों को बेहतर एग्ज़िट मिल सके।
मुख्य बिंदु
- नया फिक्स्ड‑प्राइस डीलिस्टिंग फ्रेमवर्क लागू
- ऑफ़र प्राइस को फ्लोर प्राइस से कम से कम 15 % ऊपर रखना होगा
- लागू होगा केवल गैर‑बैंकिंग, गैर‑बीमा पीएसयू जिनमें सरकारी‑निजी हिस्सेदारी ≥ 90 %
सेबी ने अपनी 2025‑26 वार्षिक रिपोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) की स्वैच्छिक डीलिस्टिंग के लिए एक विशेष फिक्स्ड‑प्राइस फ्रेमवर्क घोषित किया है। इस कदम का उद्देश्य डीलिस्टिंग प्रक्रिया को सरल बनाना और शेयर‑कीमत निर्धारण में पुरानी पद्धति से उत्पन्न समस्याओं को समाप्त करना है।
नए नियम के अनुसार, पात्र पीएसयू की डीलिस्टिंग में ऑफर प्राइस को फ्लोर प्राइस से कम से कम 15 % अधिक रखेगा। यह प्रीमियम सभी छोटे शेयरधारकों को सुनिश्चित नहीं करता, बल्कि वास्तविक लाभ उनकी प्रारंभिक खरीद मूल्य और निर्धारित ऑफर प्राइस पर निर्भर करेगा।
फ्लोर प्राइस की गणना अब तीन मानदंडों पर आधारित होगी: (1) पिछले 52 हफ्तों में वॉल्यूम‑वेटेड औसत कीमत, (2) पिछले 26 हफ्तों में सबसे ऊँची कीमत, और (3) दो स्वतंत्र वैल्यूएटर की संयुक्त रिपोर्ट। इनमें से सर्वोच्च मान को फ्लोर प्राइस माना जाएगा, जिससे केवल बाजार‑भाव पर निर्भरता कम होगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पहले के फ्रेमवर्क में फ्लोर प्राइस तय करने के लिए 60‑दिन का वॉल्यूम‑वेटेड औसत प्रयोग किया जाता था, जिससे कई बार प्राइस अत्यधिक ऊँचा हो जाता था और सरकार या प्रमोटर के लिए शेयर पुनः खरीदना महँगा पड़ता था। नया मॉडल वित्तीय वास्तविकता को अधिक प्रतिबिंबित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह नियम छोटे निवेशकों के भरोसे को बढ़ा सकता है, क्योंकि अब डीलिस्टिंग के बाद न्यूनतम 15 % प्रीमियम की गारंटी है, जिससे सार्वजनिक धन की सुरक्षा में सुधार होगा।
"फिक्स्ड‑प्राइस फ्रेमवर्क से डीलिस्टिंग प्रक्रिया पारदर्शी होगी और सरकारी कंपनियों के शेयरों में निवेश का जोखिम घटेगा," कहते हैं वित्त विश्लेषक रजत शर्मा।
Frequently Asked Questions
- डीलिस्टिंग के बाद शेयर बेचने का समय‑सीमा क्या है? शेयरधारकों को एक साल के भीतर ट्रेडिंग बंद होने पर एक्सचेंज में दावा प्रस्तुत करना होगा; दावा न करने पर रकम सात साल के बाद संबंधित फंड में ट्रांसफर हो जाएगी।
- क्या सभी सरकारी कंपनियों पर यह नियम लागू होगा? नहीं। यह केवल गैर‑बैंकिंग, गैर‑बीमा पीएसयू पर लागू होगा, जिनमें भारत सरकार और अन्य पीएसयू की संयुक्त हिस्सेदारी कम से कम 90 % हो।