परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार 'शांति अधिनियम' (SHANTI Act) के तहत परमाणु संचालकों के लिए नागरिक देयता सीमा की हर पांच साल में समीक्षा करेगी। नए ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, रिएक्टरों के आकार के आधार पर देयता की सीमा तय की गई है।
- शांति अधिनियम के तहत परमाणु संचालकों की नागरिक देयता सीमा की हर 5 साल में विशेषज्ञ समूह द्वारा समीक्षा की जाएगी।
- नए नियमों में रिएक्टर की क्षमता (MWe) के आधार पर अलग-अलग देयता सीमाएं (Graded Liability Caps) निर्धारित की गई हैं।
- विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए 'राइट ऑफ रिसोर्स' के प्रावधानों में बदलाव किया गया है, जिससे निवेश को बढ़ावा मिल सके।
नई दिल्ली: परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, परमाणु ऊर्जा विभाग ने शांति अधिनियम (SHANTI Act) के मसौदा नियम जारी किए हैं। इन नियमों के अनुसार, परमाणु दुर्घटना की स्थिति में संचालकों की नागरिक देयता (Civil Liability) की अधिकतम सीमा की हर पांच साल में एक विशेषज्ञ समूह द्वारा समीक्षा की जाएगी।
मसौदा नियम के नियम 78 के तहत, केंद्र सरकार परमाणु विज्ञान, इंजीनियरिंग, बीमा, कानून और जनहित प्रतिनिधियों के एक बहु-विषयक विशेषज्ञ समूह का गठन करेगी। यह समूह परमाणु संचालकों की देयता सीमा की समीक्षा करेगा और अधिनियम की दूसरी अनुसूची में संशोधन के लिए सिफारिशें पेश करेगा।
नया श्रेणीबद्ध देयता ढांचा (Graded Liability Framework)
पुराने 'नागरिक परमाणु क्षति देयता अधिनियम, 2010' (CLNDA) के तहत 1,500 करोड़ रुपये की एक समान सीमा थी। हालांकि, शांति अधिनियम एक आधुनिक और श्रेणीबद्ध दृष्टिकोण अपनाता है। नए ढांचे के तहत देयता सीमा रिएक्टर की क्षमता पर निर्भर करेगी:
| रिएक्टर क्षमता (MWe) | अधिकतम देयता सीमा (करोड़ रुपये में) |
|---|---|
| 3,600 से अधिक | 3,000 |
| 1,500 - 3,600 | 1,500 |
| 750 - 1,500 | 750 |
| 150 - 750 | 300 |
| 150 से कम | 100 |
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह बदलाव परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए किया गया है, क्योंकि यह जोखिमों को अधिक स्पष्ट और प्रबंधनीय बनाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी अत्यंत संवेदनशील है। वर्तमान में यह मामला उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष भी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि शांति अधिनियम निजी और विदेशी कंपनियों को परमाणु संयंत्र चलाने की अनुमति देकर और देयता की सीमा को बहुत कम रखकर संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
परमाणु सुरक्षा और निवेश के बीच का यह संतुलन भारत की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए निर्णायक होगा।
एक अन्य विवादास्पद बदलाव 'राइट ऑफ रिसोर्स' (Right of Recourse) का है। नए नियमों में उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ संचालकों के उस अधिकार को सीमित किया गया है, जो दोषपूर्ण उपकरण (Defective Equipment) की आपूर्ति के मामले में लागू होता था। विदेशी वेंडरों ने पहले ही इसे निवेश के लिए एक बड़ी बाधा बताया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का परमाणु कानून लंबे समय से विकसित हो रहा है। 2010 के CLNDA ने सख्त नियम बनाए थे, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा और निजी क्षेत्र की भागीदारी की आवश्यकता ने सरकार को शांति अधिनियम की ओर धकेला, जो अधिक लचीला और निवेश-अनुकूल होने का दावा करता है।
Frequently Asked Questions
1. शांति अधिनियम के तहत देयता सीमा की समीक्षा कौन करेगा?
केंद्र सरकार परमाणु विज्ञान, इंजीनियरिंग, बीमा और कानून के विशेषज्ञों का एक समूह बनाएगी जो हर 5 साल में इसकी समीक्षा करेगा।
2. नए नियमों में देयता सीमा कैसे तय की गई है?
यह रिएक्टर की मेगावाट क्षमता (MWe) पर आधारित है; बड़े रिएक्टरों के लिए सीमा अधिक और छोटे रिएक्टरों के लिए कम है।