सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'उद्योग' की परिभाषा पर दिए गए हालिया फैसले ने देश के प्रमुख ट्रेड यूनियनों के बीच चिंता पैदा कर दी है। श्रमिक नेताओं का आरोप है कि यह फैसला कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा देता है और संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करता है।

  • सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 'उद्योग' की पुरानी परिभाषा को नए औद्योगिक संबंध कोड पर लागू करने से इनकार कर दिया है।
  • CITU और AITUC जैसे बड़े श्रमिक संगठनों ने इस फैसले को श्रमिकों के अधिकारों के खिलाफ बताया है।
  • आलोचकों का कहना है कि यह फैसला 'सॉवरेन फंक्शन' के नाम पर श्रम सुरक्षा को कम कर सकता है।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले ने देश भर के श्रमिक संगठनों में हलचल मचा दी है। नौ न्यायाधीशों की एक पीठ ने यह निर्णय दिया है कि 1978 के ऐतिहासिक फैसले में दी गई 'उद्योग' की परिभाषा अब नए औद्योगिक संबंध कोड (Industrial Relations Code) पर लागू नहीं होगी। इस फैसले को लेकर ट्रेड यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यह निर्णय श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ और 'ट्रिपल टेस्ट' का अंत

वर्ष 1978 में, न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर के नेतृत्व में सात न्यायाधीशों की पीठ ने बेंगलुरु वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम आर. राजप्पा मामले में एक मील का पत्थर स्थापित किया था। उस फैसले में 'ट्रिपल टेस्ट' का सिद्धांत दिया गया था, जिसके अनुसार यदि किसी संगठन में व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध और मानवीय आवश्यकताओं के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन/वितरण होता है, तो उसे 'उद्योग' माना जाएगा, चाहे उसका उद्देश्य लाभ कमाना हो या नहीं।

CITU के महासचिव एलमराम करीम ने कहा कि यह फैसला उस व्यापक परिभाषा को समाप्त कर देता है जो दशकों से देश का कानून बनी हुई थी। उन्होंने तर्क दिया कि अब उद्योगों को उनके काम के बजाय उनके संस्थागत स्वरूप के आधार पर परिभाषित किया जाएगा, जो श्रमिकों के लिए नुकसानदेह है।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह कानूनी बदलाव भारत के श्रम बाजार के भविष्य को बदल सकता है। यदि 'सॉवरेन कार्यों' और 'परोपकारी संस्थाओं' के तहत उद्योगों को बाहर कर दिया जाता है, तो लाखों कर्मचारी कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकते हैं।

न्यायपालिका और विधायिका दोनों ही उन संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहे हैं जो श्रमिकों को दिए गए हैं।

AITUC की महासचिव अमरजीत कौर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नए कोड की धारा 2(p) का ढांचा बहुत संकीर्ण है। उन्होंने कहा कि निजीकरण और आउटसोर्सिंग के इस दौर में, संस्थागत लेबल के आधार पर काम की प्रकृति को अनदेखा करना सीधे तौर पर श्रमिक वर्ग के हितों पर प्रहार है।

श्रमिक संगठनों की प्रतिक्रिया

ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ इंडिया (TUCI) के अध्यक्ष फ्रेडी के. थाझाथ ने चेतावनी दी है कि इस फैसले से श्रम शांति भंग हो सकती है और श्रमिकों को अपने अधिकारों के लिए फिर से संघर्ष करने पर मजबूर होना पड़ेगा। संगठनों का मानना है कि यह फैसला कॉर्पोरेट जगत के अनुकूल है और श्रमिकों की सुरक्षा को कम करता है।

क्या आप जानते हैं?: 1978 का 'ट्रिपल टेस्ट' सिद्धांत दशकों तक यह सुनिश्चित करता रहा कि गैर-लाभकारी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारी भी कानूनी रूप से 'उद्योग' के दायरे में आ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला क्या है?
कोर्ट ने कहा है कि 1978 का व्यापक 'उद्योग' का नियम अब नए औद्योगिक संबंध कोड पर लागू नहीं होगा।

2. ट्रेड यूनियनों को इससे क्या खतरा है?
उन्हें डर है कि इससे श्रमिकों की कानूनी सुरक्षा कम हो जाएगी और कंपनियों के लिए उन्हें नियंत्रित करना आसान हो जाएगा।