नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने बताया कि उच्च टैरिफ वाले हाइब्रिड और साधारण सोलर प्रोजेक्ट्स को डिस्कॉम से खरीदार खोजने में कठिनाई हो रही है। लगभग 42 GW क्षमता बिना बिजली खरीद समझौते (PPA) के अटकी हुई है।
- उच्च टैरिफ वाले हाइब्रिड और 'वैनिला' सोलर प्रोजेक्ट्स को डिस्कॉम से खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं।
- लगभग 42 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वर्तमान में बिना PPA के लंबित है।
- सरकार 2030 तक 30 GW पॉलीसिलिकॉन निर्माण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रख रही है।
- लिथियम-आयन के विकल्प के रूप में सोडियम-आयन और वैनेडियम फ्लो बैटरी पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्गएनईएफ (BloombergNEF) शिखर सम्मेलन में, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने ऊर्जा क्षेत्र की एक गंभीर चुनौती पर प्रकाश डाला। उन्होंने खुलासा किया कि उच्च टैरिफ वाले हाइब्रिड प्रोजेक्ट्स और 'वैनिला' सोलर प्रोजेक्ट्स (बिना बैटरी स्टोरेज वाले मानक सौर प्रोजेक्ट) को बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) से खरीदार खोजने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है।
वर्तमान में, लगभग 42 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता ऐसे स्तर पर है जिसके लिए अभी तक बिजली खरीद समझौते (PPA) नहीं किए गए हैं। सारंगी ने बताया कि रिन्यूएबल एनर्जी इम्प्लीमेंटिंग एजेंसीज (REIAs) को डिस्कॉम के साथ समन्वय करने और इस क्षमता की खरीद को सुगम बनाने के तरीके खोजने के निर्देश दिए गए हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यदि इन परियोजनाओं को समय पर खरीदार नहीं मिले, तो यह भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों और निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है। डिस्कॉम अक्सर कम लागत वाली ऊर्जा को प्राथमिकता देते हैं, जिससे उच्च टैरिफ वाले प्रोजेक्ट्स बाजार से बाहर होने के जोखिम में हैं।
डेवलपर्स अब वैनिला सोलर प्रोजेक्ट्स को डिस्कॉम के लिए अधिक आकर्षक बनाने हेतु उनमें बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) जोड़ रहे हैं।
इस संकट से निपटने के लिए, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने जुलाई 2026 में एक नया नियम पेश किया है। यह नियम डेवलपर्स को 'एग्जिट ऑप्शन' (निकास विकल्प) प्रदान करता है, जिससे वे बिना अपनी बैंक गारंटी गंवाए प्रोजेक्ट से बाहर निकल सकते हैं। सारंगी ने संकेत दिया कि यदि कोई समाधान नहीं निकलता है, तो या तो डेवलपर्स बाहर निकल जाएंगे या REIAs को इन निविदाओं को रद्द करना होगा।
भविष्य की रणनीति की बात करें तो, भारत अपनी सौर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए 2030 तक 30 GW पॉलीसिलिकॉन निर्माण क्षमता जोड़ने की योजना बना रहा है। वर्तमान में, भारत सौर मॉड्यूल के लिए कच्चे माल के रूप में पॉलीसिलिकॉन के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
तकनीकी नवाचार के मोर्चे पर, मंत्रालय लिथियम-आयन बैटरी (LFP) से आगे बढ़कर सोडियम-आयन और वैनेडियम फ्लो बैटरी पर दांव लगा रहा है। NTPC ग्रीन एनर्जी लिमिटेड ने पहले ही वैनेडियम फ्लो बैटरी के लिए 100 मेगावाट का ऑर्डर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 2-3 वर्षों में इनकी लागत प्रतिस्पर्धी हो जाएगी।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: वैनिला सोलर प्रोजेक्ट्स के साथ क्या समस्या है?
उत्तर: इनका टैरिफ अधिक होने के कारण डिस्कॉम इन्हें खरीदने में हिचकिचा रहे हैं, क्योंकि वे सस्ती ऊर्जा को प्राथमिकता देते हैं।
प्रश्न 2: भारत पॉलीसिलिकॉन उत्पादन क्यों बढ़ाना चाहता है?
उत्तर: वर्तमान में भारत सौर पैनलों के लिए आवश्यक पॉलीसिलिकॉन के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है, जिसे आत्मनिर्भरता के लिए कम करना आवश्यक है।