पंजाब के मानसा जिले के हरभजन सिंह तग्गर ने गांव के तालाबों का इस्तेमाल कर एक ऐसा एकीकृत कृषि मॉडल तैयार किया है, जो सालाना लाखों का मुनाफा कमा रहा है। मछली पालन, पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण के मेल से उन्होंने खेती को एक बड़े व्यवसाय में बदल दिया है।
- हरभजन सिंह तग्गर ने गांव के तालाबों को पट्टे पर लेकर मछली पालन शुरू किया।
- उनका 'जीरो वेस्ट' मॉडल मछली, सूअर, बकरी, मुर्गी पालन और फसलों को जोड़ता है।
- मछली पालन से वे सालाना 50-60 लाख रुपये की बचत कर रहे हैं।
- उन्होंने 'खियाला' ब्रांड के तहत खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) में भी कदम रखा है।
पंजाब के मानसा जिले के मलाकपुर खियाला गांव के हरभजन सिंह तग्गर की कहानी उन सभी के लिए एक मिसाल है जो पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने का साहस रखते हैं। 1980 के दशक में, जब स्नातक करने के बाद नौकरी ढूंढना एक बड़ी चुनौती थी, तग्गर ने ट्रैक्टर मरम्मत की वर्कशॉप खोली और खेती की। लेकिन उनकी असली सफलता तब शुरू हुई जब उन्होंने गांव के तालाबों (छप्परों) में मछली पालन की संभावना देखी।
तग्गर ने न केवल अपनी 9 एकड़ जमीन को मछली पालन के लिए विकसित किया, बल्कि गांव के अन्य तालाबों को भी पट्टे पर लेना शुरू किया। आज, उनका साम्राज्य 19 एकड़ निजी भूमि और 40 एकड़ पट्टे पर लिए गए तालाबों तक फैल चुका है। उनकी रणनीति केवल मछली पालने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाया है जहां कुछ भी बर्बाद नहीं होता।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि तग्गर का मॉडल भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक ब्लूप्रिंट हो सकता है। जहां पारंपरिक फसलें (गेहूं और धान) जलवायु परिवर्तन और घटते मुनाफे से जूझ रही हैं, वहीं एकीकृत कृषि (Integrated Farming) किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
"कुछ भी बर्बाद नहीं होना चाहिए" - तग्गर का यह सिद्धांत ही उनके व्यवसाय की रीढ़ है।
उनके फार्म में मछली, सूअर, बकरी, मुर्गी और अनाज का एक चक्र चलता है। उदाहरण के लिए, सूअरों का अपशिष्ट मछली के लिए प्राकृतिक भोजन (प्लांकटन) बनाने में मदद करता है, और मछली पालन के बाद बचा हुआ पोषक तत्वों से भरपूर पानी फसलों की सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
विविधता और लाभ का तुलनात्मक विवरण
| गतिविधि | विवरण | आर्थिक प्रभाव |
|---|---|---|
| मछली पालन | 6 प्रजातियां (रोहू, कतला आदि) | ₹25-30 लाख वार्षिक बिक्री |
| पशुपालन | 100 सूअर और 100 बकरियां | खाद और मछली आहार में बचत |
| खाद्य प्रसंस्करण | 'खियाला' ब्रांड (अचार, मांस उत्पाद) | अतिरिक्त मूल्यवर्धन (Value Addition) |
तग्गर ने अपनी सफलता के लिए निरंतर सीखने पर जोर दिया है। उन्होंने आंध्र प्रदेश, ओडिशा और लुधियाना के संस्थानों से मत्स्य पालन का प्रशिक्षण लिया। आज उनके बेटे, सुखदीप सिंह तग्गर (MBA) और मनदीप सिंह, इस व्यवसाय को आधुनिक तरीके से प्रबंधित करने में उनकी मदद कर रहे हैं।
Frequently Asked Questions
1. तग्गर के मॉडल की मुख्य विशेषता क्या है?
इसकी मुख्य विशेषता 'जीरो वेस्ट' या एकीकृत कृषि है, जहां एक पशुधन का अपशिष्ट दूसरे के लिए संसाधन बनता है।
2. क्या मछली पालन के लिए केवल निजी भूमि आवश्यक है?
नहीं, तग्गर ने गांव के तालाबों को पट्टे पर लेकर भी अपना व्यवसाय बड़े स्तर पर फैलाया है।