भारत में चीनी की कीमतों में अचानक उछाल के पीछे इथेनॉल मिश्रण नहीं, बल्कि सरकार की नीतिगत गलतियां हैं। उत्पादन में कमी और निर्यात प्रतिबंधों जैसे फैसलों ने संकट को और गहरा कर दिया है।

  • चीनी की कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण उत्पादन में कमी है, न कि इथेनॉल का उपयोग।
  • सरकार द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध और स्टॉक सीमा लगाने जैसे फैसलों ने बाजार में अस्थिरता पैदा की।
  • इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का उपयोग कुल उत्पादन का केवल एक छोटा हिस्सा है।

भारत में चीनी एक अत्यधिक राजनीतिक वस्तु बन चुकी है। हाल ही में खुदरा कीमतों में ₹45 से बढ़कर ₹65 प्रति किलो तक की वृद्धि ने जनता के बीच भारी असंतोष पैदा किया है। अक्सर इस वृद्धि का दोष इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम पर मढ़ दिया जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और कड़वी है।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह कहना गलत है कि इथेनॉल चीनी की कमी का कारण है। वर्ष 2025-26 में तेल विपणन कंपनियों को आपूर्ति किए गए इथेनॉल का केवल 27.5 प्रतिशत ही गन्ने के रस और शीरे से बनाया गया था; शेष अनाज से प्राप्त किया गया था। इसके अलावा, इथेनॉल बनाने के लिए डायवर्ट की गई 3 मिलियन टन चीनी, 30.9 मिलियन टन के कुल उत्पादन का मात्र एक दसवां हिस्सा है। पिछले चार वर्षों में भी इसी तरह के डायवर्जन देखे गए, लेकिन तब कीमतों में इस तरह का उछाल नहीं आया था।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है

चीनी की कीमतों में यह उछाल मुख्य रूप से उत्पादन में आई भारी कमी के कारण है। शुरुआत में 34.4 मिलियन टन के अनुमान के मुकाबले वास्तविक उत्पादन काफी कम रहा। सरकार को इस कमी का अनुमान फरवरी तक ही लगा लेना चाहिए था, जब उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की मिलें गन्ने की कमी से जूझ रही थीं।

चीनी संकट बाजार की शक्तियों की अनदेखी और सरकार की ढीली नीतिगत प्रतिक्रिया का परिणाम है।

जब जुलाई में कीमतें बढ़ने लगीं, तो सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया और डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा लगा दी। ये 'घबराहट में लिए गए निर्णय' (knee-jerk actions) बाजार में आग में घी डालने का काम कर गए। सरकार को निर्यात रोकने के बजाय, आयात शुल्क को 100 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर देना चाहिए था ताकि आपूर्ति संतुलित हो सके।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में चीनी उद्योग दशकों से सरकारी नियंत्रण के अधीन रहा है। गन्ने के मूल्य निर्धारण से लेकर मिलों द्वारा खुले बाजार में बिक्री की मात्रा तक, लगभग हर चीज़ सरकार तय करती है। यह अत्यधिक नियंत्रण अक्सर बाजार की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने में विफल रहता है।

क्या आप जानते हैं?: भारत में चीनी का उत्पादन केवल खाद्य सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा (इथेनॉल के माध्यम से) के लिए भी महत्वपूर्ण है।

Frequently Asked Questions

1. क्या इथेनॉल के कारण चीनी महंगी हुई है?
नहीं, डेटा दिखाता है कि इथेनॉल के लिए उपयोग की जाने वाली चीनी कुल उत्पादन का बहुत छोटा हिस्सा है।

2. सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए?
सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाया और डीलरों के लिए स्टॉक रखने की सीमा तय की, लेकिन ये कदम प्रभावी नहीं रहे।