कपास की कीमतों में भारी उछाल और सूत की बढ़ती मांग के बीच, कपड़ा मिलें परिचालन लागत और मुनाफे के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

  • कपास की कीमतें ₹57,000 से बढ़कर ₹70,000 प्रति कैंडी तक पहुंच गई हैं।
  • सूत की मांग में सुधार हुआ है और मिलों का क्षमता उपयोग 90% से अधिक है।
  • चीन की बढ़ती मांग और अमेरिका/चीन में कम उत्पादन की आशंका कीमतों के बढ़ने का मुख्य कारण है।
  • कपड़ा मिलें अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं।

तमिलनाडु के कोयंबटूर सहित देश के प्रमुख कपड़ा केंद्रों में इस समय एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां सूत (yarn) की मांग में सुधार के संकेत मिल रहे हैं और मिलों का क्षमता उपयोग 90% के स्तर को पार कर गया है, वहीं दूसरी ओर कच्चे माल, यानी कपास की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने मिल मालिकों की नींद उड़ा दी है।

साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के अध्यक्ष दुराई पलानीसामी के अनुसार, सूत की मांग पिछले पांच महीनों से सुधर रही है, लेकिन कच्चे माल की बढ़ती लागत इस सुधार के लाभ को कम कर रही है। मिलों के पास वर्तमान में कपास का स्टॉक बहुत कम है, जो आमतौर पर दो महीने से भी कम का है।

क्यों यह महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि कपास की कीमतों में यह उछाल केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के असंतुलन का परिणाम है। कपास की कीमतें, जो पिछले साल अक्टूबर से मार्च 2026 के बीच ₹51,700 से ₹57,000 प्रति कैंडी के बीच थीं, अब 2 सितंबर को ₹70,000 प्रति कैंडी तक पहुंच गई हैं।

कपास की कीमतों में यह तीव्र वृद्धि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकती है।

इंडियन कॉटन फेडरेशन के सचिव निशांत अशेर ने बताया कि चीन से बढ़ती मांग और अमेरिका एवं चीन में कम उत्पादन की संभावना कीमतों को ऊपर धकेल रही है। इसके चलते सूत की कीमतों में भी वृद्धि हुई है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत का कपड़ा उद्योग सदियों से कपास पर आधारित रहा है। ऐतिहासिक रूप से, जब भी वैश्विक मांग बढ़ती है या प्रमुख उत्पादक देशों (जैसे अमेरिका) में फसल कम होती है, तो भारतीय मिलों को लागत के दबाव का सामना करना पड़ता है। वर्तमान स्थिति पिछले कुछ वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण दौरों में से एक है।

कॉटन टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के उपाध्यक्ष रवि सैम का कहना है कि घरेलू परिधान क्षेत्र कपास की बढ़ती कीमतों के कारण पूरी मांग को पूरा नहीं कर पा रहा है, जिससे मिलों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर रुख करना पड़ रहा है।

Did You Know?: कपास को 'सफेद सोना' कहा जाता है क्योंकि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Frequently Asked Questions

1. कपास की कीमतों में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है?
चीन से बढ़ती मांग और अमेरिका व चीन में कम उत्पादन की आशंका मुख्य कारण हैं।

2. क्या इससे कपड़ों की कीमतें बढ़ेंगी?
हाँ, कच्चे माल की लागत बढ़ने से सूत और अंततः तैयार कपड़ों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।