एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्र ने NCLT द्वारा गठित पांच सदस्यीय बेंच की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनके वकील ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल के पास ऐसी बेंच बनाने का अधिकार नहीं है।

  • सुभाष चंद्र ने NCLT की पांच सदस्यीय बेंच के गठन को अवैध बताया।
  • एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन के खिलाफ ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले मात्र ₹6.5 करोड़ के भुगतान का मामला है।
  • NCLAT ने स्पष्ट किया कि बेंच के गठन को चुनौती देने का मामला अभी उनके समक्ष नहीं है।

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्र के व्यक्तिगत दिवाला मामले में कानूनी लड़ाई एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच गई है। बुधवार को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के समक्ष सुनवाई के दौरान, उनके वरिष्ठ अधिवक्ता सस्मित पात्रा ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा गठित पांच सदस्यीय बेंच के निर्णय को "दोषपूर्ण और गलत" करार दिया। पात्रा ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल के पास इस तरह की बड़ी बेंच गठित करने का कानूनी अधिकार या शक्ति नहीं है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब NCLT ने एक पांच सदस्यीय बेंच बनाई जिसने न्यायाधीश नीलेश शर्मा के आदेश पर रोक लगा दी थी। नीलेश शर्मा को एक विभाजनकारी निर्णय (split verdict) के बाद तीसरे सदस्य के रूप में लाया गया था। बचाव पक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में कानूनी सीमाओं का उल्लंघन किया गया है और कंपनी अधिनियम के तहत दी गई शक्तियों का गलत इस्तेमाल हुआ है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति के दिवाला का नहीं है, बल्कि यह कॉर्पोरेट कानून के तहत ट्रिब्यूनल की शक्तियों की व्याख्या का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। यदि NCLT की बेंच गठन की प्रक्रिया को अवैध माना जाता है, तो इससे भविष्य में कई अन्य दिवाला मामलों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।

"ट्रिब्यूनल के पास पांच सदस्यीय बेंच बनाने की कोई स्पष्ट वैधानिक शक्ति नहीं है, जो इस पूरे कानूनी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाती है।"

दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उन लेनदारों का प्रतिनिधित्व किया जो इस भुगतान योजना से असंतुष्ट हैं, जिनमें LIC हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक और यूनियन बैंक शामिल हैं। मेहता ने तर्क दिया कि मामला बहुत ही "अजीब परिस्थितियों" से भरा है, जिसमें तीन अलग-अलग विचार सामने आए हैं, इसलिए इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एक बड़ी बेंच की आवश्यकता है।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लेनदारों द्वारा किए गए कुल ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले, सुभाष चंद्र केवल ₹6.5 करोड़ का भुगतान करने का प्रस्ताव दे रहे हैं। NCLT ने इस बीच चंद्र को अपनी संपत्ति बेचने से भी रोक दिया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

एस्सेल ग्रुप पिछले कुछ वर्षों से भारी वित्तीय संकट और ऋण के बोझ से जूझ रहा है। सुभाष चंद्र के व्यक्तिगत दिवाला मामले ने कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है क्योंकि यह व्यक्तिगत गारंटी और समूह ऋणों के बीच के जटिल संबंधों को उजागर करता है।

Did You Know?: NCLT भारत में कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया को संचालित करने वाली प्राथमिक संस्था है।

Frequently Asked Questions

1. सुभाष चंद्र के खिलाफ कुल कितना दावा किया गया है?
लेनदारों ने कुल ₹22,006 करोड़ के दावों को प्रस्तुत किया है।

2. NCLAT का इस मामले पर क्या रुख है?
NCLAT ने फिलहाल बेंच के गठन को चुनौती देने के मुद्दे को अपने समक्ष नहीं माना है और मामले को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।