तमिलनाडु विवसायि संगम ने सांबा धान की फसल को बचाने के लिए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप और विशेष सब्सिडी की मांग की है। संगठन ने कावेरी जल विवाद और कृषि भूमि के शहरीकरण के खिलाफ भी चेतावनी दी है।

  • सांबा और थलाडी धान की खेती के लिए 16 लाख एकड़ भूमि पर पानी की आवश्यकता है।
  • किसान संगठन ने बीज, उर्वरक और मशीनरी पर 50% सब्सिडी की मांग की है।
  • कावेरी जल विवाद को सुलझाने के लिए कानूनी लड़ाई तेज करने का आग्रह किया गया है।
  • वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) के विकास के लिए प्रस्तावित कानून का विरोध किया गया है।

तिरुचिरापल्ली: तमिलनाडु विवसायि संगम, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध है, ने राज्य सरकार से इस वर्ष सांबा धान की खेती को समर्थन देने के लिए विशेष पहल करने का आग्रह किया है। संगठन की राज्य समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि चूंकि 'कुरुवाई' सीजन से होने वाली आय का नुकसान पहले ही हो चुका है, इसलिए सांबा फसल को बचाना अत्यंत आवश्यक है।

संगठन के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि सांबा और थलाडी धान की खेती लगभग 16 लाख एकड़ भूमि पर की जानी है। किसानों के लिए इस फसल का नुकसान झेलना आर्थिक रूप से असंभव है। इसके लिए उन्होंने मांग की है कि सरकार कर्नाटक से तमिलनाडु के हिस्से का कावेरी जल प्राप्त करने के लिए कानूनी लड़ाई तेज करे।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि दक्षिण भारत में धान की खेती पूरी तरह से जल प्रबंधन और सरकारी नीतियों पर निर्भर है। यदि सांबा सीजन में पानी की कमी होती है, तो यह न केवल किसानों की आय को प्रभावित करेगा बल्कि राज्य की खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।

संगठन ने मांग की है कि 15 नवंबर से मेट्टूर जलाशय से 16,000 क्यूसेक पानी छोड़ा जाना चाहिए और कल्लनई से बारी-बारी (turn system) से पानी का वितरण किया जाना चाहिए। साथ ही, जल संसाधन विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए 'लस्करों' की तैनाती करनी चाहिए कि पानी अंतिम छोर (tail-end) के खेतों तक पहुंचे।

कृषि संकट को टालने के लिए केवल पानी ही नहीं, बल्कि बीज से लेकर कटाई तक सरकारी सब्सिडी और तकनीकी सहायता का होना अनिवार्य है।

वित्तीय सहायता के संबंध में, किसानों ने मांग की है कि सरकार लघु और मध्यम धान की किस्मों के बीजों और उर्वरकों पर 50% सब्सिडी प्रदान करे। इसके अतिरिक्त, मशीनी रोपण (machine planting) के लिए भी समान सब्सिडी देने का प्रस्ताव रखा गया है। किसानों ने यह भी जोर दिया कि फसल बीमा योजना निजी कंपनियों के बजाय सीधे सरकार द्वारा संचालित होनी चाहिए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

तमिलनाडु में धान की खेती का इतिहास सदियों पुराना है, जो कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र पर निर्भर है। 'सांबा' और 'कुरुवाई' जैसे शब्द धान के विभिन्न मौसमों को दर्शाते हैं। हाल के वर्षों में, जलवायु परिवर्तन और अंतर-राज्यीय जल विवादों ने इन पारंपरिक कृषि चक्रों को गंभीर रूपतः प्रभावित किया है।

वेटलैंड्स और शहरीकरण का खतरा

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव में, संगठन ने तमिलनाडु टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1971 में संशोधन के लिए लाए गए विधेयक को वापस लेने की मांग की है। यह विधेयक गैर-नियोजित क्षेत्रों में वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) के विकास के लिए जिला कलेक्टरों की पूर्व सहमति की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रयास करता है। किसानों का तर्क है कि यदि यह पारित हो गया, तो शहरी विकास के नाम पर कृषि भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान होगा।

Did You Know?: सांबा धान की फसल तमिलनाडु के कृषि कैलेंडर में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह बड़े पैमाने पर खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

Frequently Asked Questions

1. किसान संगठन ने किन प्रमुख सब्सिडी की मांग की है?
संगठन ने बीज, उर्वरक और मशीनरी के उपयोग पर 50% सब्सिडी की मांग की है।

2. कावेरी जल वितरण के लिए क्या सुझाव दिया गया है?
सुझाव दिया गया है कि मेट्टूर जलाशय से 16,000 क्यूसेक पानी छोड़ा जाए और कल्लनई से बारी-बारी से वितरण हो।