सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ डेवलपर्स द्वारा होमबायर्स को फ्लैट देने या रिफंड करने के प्रस्ताव को 'देरी करने की रणनीति' बताकर खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कंपनी को व्यापक प्रस्ताव पेश करने का अंतिम मौका देते हुए 500 करोड़ रुपये जमा करने का सुझाव दिया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ डेवलपर्स के एक साल में कब्जा देने के प्लान को खारिज किया।
- कोर्ट ने कंपनी को सभी सहायक कंपनियों और अलॉटियों को शामिल करते हुए व्यापक प्रस्ताव देने का निर्देश दिया।
- अदालत ने 500 करोड़ रुपये की राशि रजिस्ट्री में जमा करने का सुझाव दिया है।
- हरियाणा अधिकारियों और IRP की कार्यप्रणाली पर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने रियल एस्टेट क्षेत्र की दिग्गज कंपनी पार्श्वनाथ डेवलपर्स के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कंपनी के उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें होमबायर्स के दावों को निपटाने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव केवल कानूनी कार्यवाही में देरी करने का एक प्रयास प्रतीत होता है।
सुनवाई के दौरान पार्श्वनाथ के वकीलों ने दावा किया कि ग्रुप के 24 हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में से लगभग 3,000 फ्लैटों का कब्जा देना अभी बाकी है। कंपनी ने एक साल के भीतर कब्जा देने का वादा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे अपर्याप्त माना। बेंच ने कहा कि होमबायर्स दशकों से मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेल रहे हैं और अब केवल वादों से काम नहीं चलेगा।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल एक बिल्डर और ग्राहकों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में RERA जैसे नियामक निकायों की विफलता को भी दर्शाता है। जब अर्ध-न्यायिक मंचों के आदेशों की अनदेखी की जाती है, तो न्यायपालिका का सीधा हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। यह फैसला अन्य डिफॉल्टर बिल्डरों के लिए एक कड़ा संदेश है कि वे अदालती प्रक्रिया का उपयोग समय बिताने के लिए नहीं कर सकते।
"जब नियामक संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन बिल्डरों के साथ मिलीभगत करते हैं, तो आम नागरिक के पास केवल सुप्रीम कोर्ट की शरण ही बचती है, जो अब कड़े वित्तीय दंड और प्रशासनिक नियंत्रण की ओर बढ़ रहा है।"
कोर्ट ने एक हृदयविदारक मामले का उल्लेख किया जिसमें रीटा टिक्कू, जो एक कैंसर सर्वाइवर हैं, और उनके पति ने गुरुग्राम के सेक्टर 53 स्थित प्रोजेक्ट में 1.78 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। 2013 में कब्जा मिलने की समयसीमा समाप्त होने के बावजूद, 2021 तक उन्हें न घर मिला और न ही पैसा। कोर्ट ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए गहरी चिंता व्यक्त की।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (IRP) की उस मांग को भी खारिज कर दिया जिसमें कंपनी के फ्रीज किए गए बैंक खातों को चलाने की अनुमति मांगी गई थी। कोर्ट ने IRP की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि दिवाला प्रक्रिया सही ढंग से काम करती, तो लोगों को सुप्रीम कोर्ट नहीं आना पड़ता।
अदालत ने हरियाणा के अधिकारियों को भी फटकार लगाई है, जिन्होंने हरियाणा RERA के आदेशों को लागू करने में विफलता दिखाई। कोर्ट ने संकेत दिया है कि यदि अगला प्रस्ताव संतोषजनक नहीं रहा, तो वह मामले को संभालने के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी नियुक्त करेगा।
Frequently Asked Questions
1. सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ के प्रस्ताव को क्यों खारिज किया?
कोर्ट का मानना था कि कंपनी का प्रस्ताव केवल समय टालने की एक चाल थी और यह सभी प्रभावित होमबायर्स के दावों को पूरी तरह कवर नहीं करता था।
2. हाई-पावर्ड कमेटी की नियुक्ति का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि कोर्ट अब बिल्डर के भरोसे रहने के बजाय एक स्वतंत्र समिति नियुक्त कर सकता है जो सीधे तौर पर संपत्तियों और फंड्स का प्रबंधन कर होमबायर्स को राहत दिलाएगी।