सुभाष चंद्र मामले में आए विवाद के बाद, भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (IBBI) ने व्यक्तिगत गारंटी प्रक्रियाओं में बड़े बदलावों का प्रस्ताव दिया है। नए नियमों का उद्देश्य 'संबंधित पक्षों' के मतदान अधिकारों को सीमित करना और पारदर्शिता बढ़ाना है।

  • 'संबंधित पक्षों' (Related Parties) को ऋण समाधान योजनाओं पर मतदान करने से रोका जा सकता है।
  • गारंटर द्वारा किए गए संदिग्ध लेन-देन (Avoidance Transactions) की जांच अनिवार्य होगी।
  • संपत्ति के मूल्यांकन के लिए पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं की नियुक्ति आवश्यक होगी।
  • लेनदारों को ऋण समाधान योजना स्वीकार करने के व्यावसायिक कारणों को लिखित में दर्ज करना होगा।

भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (IBBI) ने कॉर्पोरेट देनदारों के व्यक्तिगत गारंटी मामलों में बैंकों और लेनदारों के हितों की रक्षा के लिए चार प्रमुख संशोधनों का प्रस्ताव दिया है। यह कदम हाल ही में सुभाष चंद्र मामले में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की विशेष पीठ द्वारा दिए गए आदेश के बाद उठाया गया है।

वर्तमान में, व्यक्तिगत गारंटी मामलों में 'सहयोगी' (Associate) को मतदान से रोका जाता है, लेकिन IBBI का मानना है कि 'सहयोगी' की परिभाषा बहुत संकीर्ण है। प्रस्तावित संशोधनों के तहत, 'संबंधित पक्ष' (Related Party) की परिभाषा को व्यापक बनाया जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी बिना किसी शेयरधारिता के भी गारंटीकर्ता के निर्देशों पर काम करती है, तो उसे 'संबंधित पक्ष' माना जाएगा और उसे मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह बदलाव दिवाला संहिता (IBC) की विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए महत्वपूर्ण है। सुभाष चंद्र मामले में, लेनदारों को उनके 22,006.57 करोड़ रुपये के दावे के बदले केवल 6.25 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया था, जिससे बैंकिंग क्षेत्र में भारी आक्रोश पैदा हुआ था।

यह संशोधन सुनिश्चित करेगा कि व्यक्तिगत गारंटी के मामलों में भी वही पारदर्शिता हो जो कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रियाओं में देखी जाती है।

प्रस्तावित नियमों के तहत, अब समाधान पेशेवरों (Resolution Professionals) को यह जांचना होगा कि क्या गारंटर ने समाधान चरण के दौरान कोई 'परिहार लेन-देन' (Avoidance Transactions) जैसे कि कम मूल्य वाले या पसंदीदा लेन-देन किए हैं। इसके अतिरिक्त, संपत्ति के उचित मूल्य का निर्धारण करने के लिए एक पंजीकृत मूल्यांकनकर्ता की नियुक्ति अनिवार्य होगी, ताकि लेनदार आर्थिक रूप से सूचित निर्णय ले सकें।

ऐतिहासिक रूप से, 2016 में लागू दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) का उद्देश्य संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करना और बैंकों का पैसा वापस लाना था। हालांकि, व्यक्तिगत गारंटी के मामलों में पारदर्शिता की कमी ने अक्सर इस कानून की प्रभावकारिता पर सवाल खड़े किए हैं।

विशेषतावर्तमान नियम (व्यक्तिगत गारंटी)प्रस्तावित नियम (IBBI प्रस्ताव)
मतदान अधिकारकेवल 'सहयोगी' प्रतिबंधित'संबंधित पक्ष' भी प्रतिबंधित
संपत्ति मूल्यांकनअनिश्चित प्रक्रियापंजीकृत मूल्यांकनकर्ता अनिवार्य
लेनदेन की जांचअनिवार्य नहींसंदिग्ध लेन-देन की जांच अनिवार्य
Did You Know?: दिवाला संहिता (IBC) को भारत में बैंकिंग क्षेत्र के फंसे हुए कर्ज (NPA) को प्रबंधित करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम माना जाता है।

Frequently Asked Questions

1. IBBI के नए प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत गारंटी मामलों में पारदर्शिता लाना और यह सुनिश्चित करना है कि 'संबंधित पक्ष' ऋण समाधान प्रक्रिया को अपने पक्ष में न मोड़ सकें।

2. सुभाष चंद्र मामला क्यों महत्वपूर्ण था?
इस मामले में लेनदारों को उनके कुल दावे के मुकाबले बहुत ही मामूली राशि (6.25 करोड़ बनाम 22,006 करोड़) का प्रस्ताव दिया गया था, जिससे कानून की खामियों का खुलासा हुआ।