एक 36‑साल के नागरिक ने पंजाब‑हरियाणा हाई कोर्ट में सार्वजनिक हित याचिका दायर की, जिसमें 'Satluj' को ZEE5 से हटाने के बिना किसी कानूनी आदेश के निरस्तीकरण को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस हटाने से मौलिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दर्शकों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

जब 36‑वर्षीय शरवण सिंह ने पंजाब‑हरियाणा हाई कोर्ट में सार्वजनिक हित याचिका (PIL) दायर की, तो उन्होंने फ़िल्म Satluj को फिर से ZEE5 OTT प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध कराने की मांग की। याचिका में कहा गया है कि फिल्म को रिलीज़ के कुछ ही दिनों बाद, बिना किसी वैध सरकारी, न्यायिक या विधायी आदेश के हटाया गया, जिससे लाखों दर्शकों के संवैधानिक अधिकार छिन गए।

पृष्ठभूमि और कानूनी ढाँचा

यह फ़िल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खलरा के जीवन पर आधारित है, जिसे हनी ट्रेहन ने निर्मित किया और दिलजीत डोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई। मूल रूप से “Punjab ’95” नाम से शुरू हुई, इसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) द्वारा कई संशोधनों के बाद “Satluj” के नाम से 3 जुलाई को ZEE5 पर डिजिटल रिलीज़ किया गया। परंतु दो दिन बाद, 5 जुलाई को इसे प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया।

याचिकाकर्ता के दावे

शरवण सिंह ने वकीलों हाक़म सिंह, अजयविर सिंह रंधावा, श्रुति और अनमोल जीवन सिंह गिल के माध्यम से भारत सरकार, CBFC, पंजाब राज्य, ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ेज़ लिमिटेड और ZEE5 के खिलाफ याचिका दायर की। उन्होंने अनुच्छेद 226 के तहत एक विशेष आदेश की मांग की, जिसमें कहा गया कि "फ़िल्म को तुरंत पूरे भारत में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराएँ" और यह सुनिश्चित किया जाए कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल वैध प्रक्रिया के आधार पर ही सीमित किया जाए।

हटाने के पीछे के प्रश्न

याचिकाकर्ता का तर्क है कि फिल्म के अचानक हटाए जाने से न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ, बल्कि उन सब्सक्राइबर्स को भी आर्थिक नुकसान हुआ, जिन्होंने पहले ही भुगतान किया था। ZEE5 ने हटाने के बाद एक सार्वजनिक बयान जारी किया, जिसमें केवल "वर्तमान विकास" का उल्लेख किया गया, लेकिन कोई वैध आदेश या न्यायिक निर्देश नहीं बताया गया। यह अस्पष्टता न्यायिक पारदर्शिता और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर प्रश्न उठाती है।

संवैधानिक और ऐतिहासिक महत्व

फ़िल्म में दर्शाए गए घटनाक्रम पहले ही सुप्रीम कोर्ट के Prithipal Singh बनाम पंजाब राज्य और पंजाब‑हरियाणा हाई कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों में चर्चा का विषय रहे हैं। याचिकाकर्ता ने इन न्यायिक निर्णयों को आधार बनाते हुए कहा कि इतिहास के ऐसे अध्यायों को बिना वैध कारण के दबाना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

आगे का रास्ता

अभी तक इस मामले की सुनवाई नहीं हुई है, परन्तु यह याचिका OTT प्लेटफ़ॉर्मों पर कंटेंट नियमन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के सांस्कृतिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। कोर्ट के फैसले का प्रभाव न केवल इस फ़िल्म तक सीमित रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य डिजिटल कंटेंट की उपलब्धता पर भी precedent स्थापित करेगा।