सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस ले सकती हैं, बशर्ते उनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक इतिहास न हो।

मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ मामले बंद कर सकती हैं।
  • यह राहत केवल उन छात्रों के लिए है जिनका कोई गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
  • हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को कोई छूट नहीं मिलेगी।
  • कोर्ट ने पुलिस द्वारा चेहरे की पहचान (Facial Recognition) तकनीक के उपयोग पर भी विचार करने को कहा है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छात्रों को बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सोमवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें उन छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को बंद या वापस ले सकती हैं, जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे।

हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण सीमा भी तय की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह राहत उन व्यक्तियों को नहीं मिलेगी जिनके खिलाफ पहले से ही "गंभीर और जघन्य" (grave and heinous) आपराधिक मामले दर्ज हैं। न्यायालय ने कहा कि 28 जुलाई के पिछले आदेश की गलत व्याख्या नहीं की जानी चाहिए; सरकारें कानून के अनुसार मामले वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला छात्र आंदोलनों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि सरकारें विरोध प्रदर्शन के कारण दर्ज किए गए सभी मामलों को वापस नहीं लेती हैं, तो यह छात्रों के भविष्य और उनके लोकतांत्रिक विरोध करने के अधिकार पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

"न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार नागरिक है, लेकिन आपराधिक पृष्ठभूमि वाले तत्वों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि पुलिस ने जांच में पाया कि प्रदर्शन स्थल पर कुछ ऐसे लोग भी मौजूद थे जिनके खिलाफ हत्या और यौन शोषण जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। इसके जवाब में, याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने चेहरे की पहचान वाली तकनीक (Facial Recognition Technology) के उपयोग पर गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जुलाई 2026 में, 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेतृत्व में संसद की ओर 'संसद चलो' मार्च निकाला गया था। इस मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें कई छात्र और सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या सभी प्रदर्शनकारियों के मामले वापस लिए जाएंगे?

नहीं, केवल वे छात्र जिनके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें ही राहत मिल सकती है।

2. क्या पुलिस ने पहचान के लिए तकनीक का उपयोग किया?

हाँ, सरकार ने चेहरे की पहचान तकनीक और रिकॉर्ड क्रॉस-चेक करने का उपयोग किया है, जिस पर अदालत में बहस चल रही है।

क्या आप जानते हैं?: सुप्रीम कोर्ट अक्सर ऐसे मामलों में 'कोएर्सिव मेजर्स' (जबरन कार्रवाई) पर रोक लगाता है ताकि शांतिपूर्ण विरोध को दबाया न जा सके।