सीबीआई ने पंजाब और दिल्ली में छापेमारी कर एक बड़े टेक-सपोर्ट धोखाधड़ी गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस मामले में मास्टरमाइंड सौरभ राणा सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जो अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाते थे।

मुख्य बातें

  • सीबीआई ने पंजाब और दिल्ली के 10 ठिकानों पर छापेमारी की।
  • मास्टरमाइंड सौरभ राणा और उसके तीन सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया।
  • गिरोह अमेरिकी नागरिकों से तकनीकी सहायता के नाम पर ठगी करता था।
  • ठगी के लिए बिटकॉइन एटीएम और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल किया जाता था।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय टेक-सपोर्ट धोखाधड़ी और जबरन वसूली गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए मास्टरमाइंड सहित चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह पंजाब और दिल्ली में संचालित कॉल सेंटरों के माध्यम से मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिकों को अपना शिकार बनाता था।

सीबीआई ने 5 और 6 अगस्त की मध्यरात्रि में पंजाब और दिल्ली के 10 अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी की। इस दौरान मोहाली में मुख्य आरोपी के परिसर से संचालित एक कॉल सेंटर को भी जब्त किया गया। छापेमारी में संचार उपकरण, स्टोरेज ड्राइव, नकद राशि और क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट के विवरण बरामद किए गए हैं। गिरफ्तार आरोपियों में मुख्य आरोपी सौरभ राणा, इंद्रमोहन सिंह, हरनीत सिंह और जप्नीदीप सिंह शामिल हैं।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि इस प्रकार के साइबर अपराधों का स्वरूप अब और अधिक जटिल हो गया है। अपराधी अब केवल पारंपरिक बैंकिंग का उपयोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि क्रिप्टोकरेंसी और बिटकॉइन एटीएम का उपयोग करके पैसे को ट्रैक करना लगभग असंभव बना देते हैं। यह मामला दर्शाता है कि कैसे भारतीय कॉल सेंटर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर अपराध के केंद्र बन रहे हैं।

साइबर अपराधियों ने अब तकनीकी खामियों के बजाय मानवीय मनोविज्ञान और भय का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

जांच में सामने आया है कि यह गिरोह माइक्रोसॉफ्ट, वित्तीय संस्थानों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रतिनिधि बनकर लोगों को डराता था। उदाहरण के तौर पर, 2022 में फ्लोरिडा की एक महिला से $4.40 लाख की वसूली की गई थी, जिसमें उसे डराया गया कि उसके कंप्यूटर पर अवैध सामग्री मौजूद है। इसी तरह, 2023 में न्यू जर्सी की एक निवासी से $1.30 लाख की ठगी की गई थी।

कार्यप्रणाली (Modus Operandi)

अपराधी कंप्यूटरों पर फर्जी 'पॉप-अप' चेतावनी भेजते थे, जिसमें तकनीकी खराबी का दावा किया जाता था। इन पॉप-अप में दिए गए फर्जी माइक्रोसॉफ्ट टोल-फ्री नंबरों पर कॉल करने पर पीड़ित सीधे गिरोह के कॉल सेंटर से जुड़ जाते थे। इसके बाद, उन्हें सिस्टम ठीक करने के नाम पर या गंभीर अपराधों (जैसे बाल पोर्नोग्राफी) में शामिल होने का डर दिखाकर बिटकॉइन एटीएम के माध्यम से भुगतान करने के लिए मजबूर किया जाता था।

क्या आप जानते हैं?: साइबर अपराधी अक्सर 'सोशल इंजीनियरिंग' का उपयोग करते हैं, जहाँ वे तकनीक से ज्यादा आपके डर और विश्वास का फायदा उठाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: यह गिरोह लोगों को कैसे पहचानता था?
उत्तर: वे कंप्यूटर पर फर्जी पॉप-अप विज्ञापन भेजकर तकनीकी समस्या का नाटक करते थे।

प्रश्न 2: ठगी के पैसे को कैसे छुपाया जाता था?
उत्तर: पैसे को विभिन्न क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट के माध्यम से घुमाकर और दिल्ली स्थित ऑपरेटरों के जरिए लॉन्ड्रिंग करके छुपाया जाता था।