सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के अनुसार, देश के हजारों जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें कई मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। रिपोर्ट में न्यायिक देरी और निगरानी की कमी पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
- देश भर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं।
- 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी के खिलाफ सर्वाधिक 89 मामले हैं।
- 519 मामले एक दशक से अधिक समय से लंबित हैं, जो न्यायिक प्रणाली की धीमी गति को दर्शाता है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पेश की गई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि वर्तमान और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ 4,192 आपराधिक मामले अभी भी विचाराधीन हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया, जिन्हें एक जनहित याचिका (PIL) के मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया था, ने अपनी 22वीं रिपोर्ट में इन आंकड़ों को प्रस्तुत किया है। यह रिपोर्ट उन जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों के त्वरित निपटान की मांग करने वाली याचिका से जुड़ी है।
रिपोर्ट के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया की सुस्ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 519 मामले पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। इसके अलावा, लगभग 700 मामले अभी भी जांच के चरण में हैं, जिनमें से 360 मामलों में तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आरोप पत्र (chargesheet) दाखिल नहीं किया गया है।
मुख्यमंत्रियों की स्थिति और राज्यवार आंकड़े
रिपोर्ट में सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी सबसे ऊपर हैं, जिन पर 89 मामले दर्ज हैं। उनके बाद पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी (29), कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार (19), आंध्र प्रदेश के एन. चंद्रबाबू नायडू (19) और केरल के वी.डी. सതീशन (18) का नाम आता है।
| राज्य/उच्च न्यायालय | लंबित मामलों की संख्या |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 1,171 |
| केरल | 543 |
| बिहार | 373 |
| महाराष्ट्र | 364 |
| ओडिशा | 330 |
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the persistence of criminal cases against high-ranking officials undermines the public's trust in the democratic process. When lawmakers, who are responsible for creating laws, are themselves entangled in prolonged legal battles, it creates a perception of 'selective justice' and systemic failure. The fact that pendency has remained above 4,000 since 2018 suggests that previous Supreme Court directives have been largely ignored or poorly implemented by the High Courts.
"The systemic delay in trying cases against legislators not only obstructs justice but also allows individuals with criminal backgrounds to maintain political power indefinitely."
ऐतिहासिक रूप से, सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 12 विशेष अदालतें स्थापित करने का आदेश दिया था। 2018 में, यह निर्देश दिया गया था कि हर जिले में एक सत्र न्यायालय और एक मजिस्ट्रेट न्यायालय को इन मामलों को प्राथमिकता देने के लिए नामित किया जाए। हालांकि, हंसारिया की रिपोर्ट बताती है कि इन आदेशों के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।
देरी के मुख्य कारणों में नामित न्यायालयों पर नियमित न्यायिक कार्य का अत्यधिक बोझ, बार-बार स्थगन (adjournments), अभियुक्तों की गैर-हाजिरी और गवाहों को पेश करने में होने वाली देरी शामिल है। एमिकस क्यूरी ने सिफारिश की है कि जब तक बैकलॉग खत्म नहीं हो जाता, नामित अदालतें केवल जनप्रतिनिधियों के मामलों की सुनवाई करें और 3 साल से अधिक पुराने मामलों की सुनवाई प्रतिदिन (day-to-day) की जाए।
Frequently Asked Questions
1. सबसे अधिक आपराधिक मामले किस मुख्यमंत्री के खिलाफ हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे अधिक 89 मामले लंबित हैं।
2. एमिकस क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट को क्या सुझाव दिए हैं?
उन्होंने सुझाव दिया है कि 3 साल से पुराने मामलों की सुनवाई प्रतिदिन हो, गवाहों के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं और अनुपस्थित रहने वाले जनप्रतिनिधियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किए जाएं।