एक 63 वर्षीय पूर्व सरकारी कर्मचारी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपने साथ हुए 1.06 करोड़ रुपये के डिजिटल अरेस्ट घोटाले की जांच CBI को सौंपने की मांग की है।

मुख्य बातें

  • पीड़ित महिला से 1.06 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई।
  • अपराधी खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच और अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बता रहे थे।
  • दिल्ली पुलिस द्वारा केवल 6 लाख रुपये की ही रिकवरी हो पाई है।
  • मामले की जांच अब CBI को सौंपने की मांग की गई है।

दिल्ली में साइबर अपराध का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 63 वर्षीय पूर्व सरकारी कर्मचारी ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। पीड़िता ने मांग की है कि उनके साथ हुए 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले की जांच दिल्ली पुलिस से हटाकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी जाए।

पीड़िता के अनुसार, नवंबर 2025 में जालसाजों ने खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताकर उन्हें डराया-धमकाया था। अपराधियों ने दावा किया कि उनका आधार नंबर आतंकवादी वित्तपोषण (terrorist funding) से जुड़ा है और उन्हें तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है। इस डर के कारण, महिला को कई दिनों तक वीडियो कॉल के माध्यम से 'डिजिटल निगरानी' में रखा गया और किसी से भी संपर्क न करने का निर्देश दिया गया।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे साइबर अपराध अब अधिक परिष्कृत और संगठित होते जा रहे हैं। जालसाज न केवल फर्जी वारंट भेजते हैं, बल्कि ED, RBI, और सुप्रीम कोर्ट जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के नाम का उपयोग करके लोगों का विश्वास जीतते हैं। इस मामले में पीड़िता ने दबाव में आकर विभिन्न बैंक खातों में कुल ₹1.06 करोड़ स्थानांतरित कर दिए थे।

डिजिटल अरेस्ट एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है, जहां अपराधी कानून का डर दिखाकर पीड़ित को पूरी तरह से अलग-थलग कर देते हैं।

पीड़िता के वकील, रोहन गुप्ता ने अदालत में तर्क दिया कि दिल्ली पुलिस की जांच धीमी है और रिकवरी बहुत कम रही है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने केवल तेलंगाना और केरल के खाताधारकों को नोटिस जारी किए हैं। इसके अलावा, बैंक द्वारा किए गए 'शैडो फ्रीज' (shadow freeze) के कारण भी धन की वसूली में बड़ी बाधा आई है, जिससे पीड़िता को केवल 6 लाख रुपये ही वापस मिल सके हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पिछले दो वर्षों में भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों में भारी वृद्धि हुई है। अपराधी अक्सर पुलिस या जांच एजेंसियों का रूप धारण करते हैं और पीड़ितों को तब तक वीडियो कॉल पर बंधक बनाए रखते हैं जब तक कि वे पैसे न दे दें।

क्या आप जानते हैं?: 'डिजिटल अरेस्ट' कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है; कानून के तहत किसी भी एजेंसी को वीडियो कॉल के माध्यम से किसी को 'गिरफ्तार' करने का अधिकार नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. डिजिटल अरेस्ट क्या है?
यह एक साइबर धोखाधड़ी है जिसमें अपराधी खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर 'गिरफ्तार' होने का नाटक करते हैं और पैसे ऐंठते हैं।

2. यदि मैं ऐसे घोटाले का शिकार हो जाऊं तो क्या करूं?
तुरंत 1930 पर कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज करें।