तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया है कि पिछड़े वर्गों से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को आरक्षण के लाभों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। मामला अब शीर्ष अदालत के फैसले पर टिका है।
मुख्य बिंदु
- तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि धर्म परिवर्तन से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन खत्म नहीं होता।
- सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकार के मार्च 2024 के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया था।
- विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि क्या 'पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)' का दर्जा दिया जा सकता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु सरकार की उस अपील पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें राज्य ने पिछड़े वर्गों, अति-पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों के उन सदस्यों को आरक्षण लाभ प्रदान करने की शक्ति की मांग की है, जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी बहस सुनी। तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि 9 मार्च, 2024 को जारी सरकारी आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों के लोग केवल धर्म परिवर्तन के कारण आरक्षण के लाभों से वंचित न रह जाएं।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारत में आरक्षण के संवैधानिक ढांचे और धार्मिक पहचान के बीच के जटिल संबंध को रेखांकित करता है। यदि सुप्रीम कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला देता है, तो यह उन समुदायों के लिए एक बड़ा मिसाल बनेगा जो धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी सामाजिक स्थिति बनाए रखना चाहते हैं।
धर्म परिवर्तन के बावजूद सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन बना रह सकता है, जो आरक्षण के मूल उद्देश्य को प्रभावित नहीं करता।
इससे पहले, मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकार के मार्च 2024 के आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति 'पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)' का दर्जा नहीं मांग सकता। उच्च न्यायालय ने तर्क दिया था कि इस्लाम एक समतावादी समाज की बात करता है और इसमें जातिगत पदानुक्रम नहीं है, इसलिए कुछ मुस्लिम संप्रदायों को 'पिछड़ा' और अन्य को 'अग्रणी' के रूप में वर्गीकृत करना विरोधाभासी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस कानूनी लड़ाई की जड़ें 1951 के एक पुराने मामले में भी देखी जा सकती हैं, जहां मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया था कि हिंदू धर्म से अलग धर्म अपनाने वालों को अनुसूचित जाति के लाभ नहीं मिल सकते। हालांकि, तमिलनाडु सरकार का कहना है कि यह मामला 'पिछड़ा वर्ग' (Backward Class) वर्गीकरण से संबंधित है, न कि अनुसूचित जाति के विशिष्ट नियमों से।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. तमिलनाडु सरकार का मुख्य तर्क क्या है?
सरकार का कहना है कि धर्म परिवर्तन से व्यक्ति की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति नहीं बदलती, इसलिए उसे आरक्षण मिलना चाहिए।
2. मद्रास उच्च न्यायालय ने क्या कहा था?
उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस्लाम में सामाजिक पदानुक्रम नहीं है, इसलिए मुस्लिम संप्रदायों को पिछड़ा या अगड़ा नहीं कहा जा सकता।