इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा की दो वयस्क बहनों को उनके पिता की कैद से मुक्त करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस कृत्य को 'पूरी तरह से अवैध' बताते हुए पिता और यूपी सरकार पर 25 लाख रुपये का मुआवजा लगाने का निर्देश दिया है।
मुख्य बिंदु
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस्लाम अपनाने वाली दो वयस्क बहनों की रिहाई का आदेश दिया।
- कोर्ट ने पिता और यूपी सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि माता-पिता को अपने वयस्क बच्चों को उनकी आस्था के कारण कैद करने का अधिकार नहीं है।
- राज्य सरकार के 'राष्ट्रीय संप्रभुता को खतरा' वाले दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में आगरा की दो बहनों को उनके पिता द्वारा अवैध रूप से कैद किए जाने के मामले में हस्तक्षेप किया है। इन महिलाओं ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था, जिसके बाद उनके पिता ने उन्हें घर में नजरबंद कर दिया था। जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने इस कृत्य को मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि आगरा पुलिस ने पिछले साल इन दोनों बहनों (उम्र 35 और 20 वर्ष) को कोलकाता से खोज निकाला था। पुलिस ने जबरन विवाह और अपहरण के आरोप में दूसरे समुदाय के एक दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने महिलाओं को उनके पिता को सौंप दिया, जिन्होंने उन्हें फिर से कैद कर लिया और उनके पासपोर्ट, शैक्षिक प्रमाण पत्र और बैंक पासबुक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त कर लिए।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक अधिकार के बीच के कानूनी संघर्ष को दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) किसी भी सामाजिक नैतिकता या माता-पिता के अधिकार से ऊपर हैं।
"संविधान माता-पिता को केवल इसलिए अपने वयस्क बच्चों को कैद करने का लाइसेंस नहीं देता क्योंकि वे उनकी आस्था, विश्वास या व्यक्तिगत पसंद से असहमत हैं।"
सुनवाई के दौरान, उत्तर प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि यह धर्मांतरण एक बड़े संगठित षड्यंत्र का हिस्सा था जो देश की एकता और संप्रभुता के लिए खतरा है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को 'काल्पनिक' बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि दो वयस्क महिलाओं का धर्म परिवर्तन देश की संप्रभुता के लिए खतरा कैसे हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: कोर्ट ने मुआवजे की राशि क्यों तय की?
कोर्ट ने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन और अवैध कैद के कारण बहनों को हुए मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न की भरपाई के लिए 25 लाख रुपये का मुआवजा तय किया।
प्रश्न 2: क्या राज्य सरकार के दावों को कोर्ट ने माना?
नहीं, कोर्ट ने सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया कि यह धर्मांतरण किसी विदेशी साजिश या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था।