सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या SHANTI एक्ट 2025 परमाणु दुर्घटनाओं के मामले में अदालतों को 'उचित और न्यायसंगत' मुआवजा तय करने से रोकता है।
- SC ने सवाल किया कि क्या SHANTI एक्ट 2025 परमाणु mishaps में उचित मुआवजे को रोकता है।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ₹3,000 करोड़ की सीमा ऑपरेटरों को सुरक्षा में कटौती के लिए प्रोत्साहित करेगी।
- कोर्ट AERB के सदस्यों की नियुक्ति में 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) की जांच कर रहा है।
- प्रशांत भूषण ने परमाणु ऊर्जा के मुकाबले सौर ऊर्जा को सुरक्षित और सस्ता विकल्प बताया।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार से सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) एक्ट, 2025 के प्रावधानों पर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत का मुख्य सवाल यह है कि क्या यह नया कानून, जिसने 2010 के परमाणु दायित्व अधिनियम का स्थान लिया है, संवैधानिक अदालतों को परमाणु आपदा की स्थिति में "उचित और न्यायसंगत" मौद्रिक मुआवजे का निर्धारण करने से रोकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने केंद्र और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को नोटिस जारी किया है। पीठ विशेष रूप से अधिनियम की धारा 17(4) की जांच कर रही है, जिसमें AERB के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की शक्ति के कारण हितों के टकराव की संभावना जताई गई है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारतीय न्यायशास्त्र के "पूर्ण दायित्व" (Absolute Liability) सिद्धांत पर प्रहार करता है। निजी ऑपरेटरों के दायित्व को ₹3,000 करोड़ और सरकार के अवशिष्ट दायित्व को ₹4,500 करोड़ तक सीमित करके, SHANTI एक्ट संभावित रूप से आपदा के वित्तीय बोझ को कॉर्पोरेशन से हटाकर जनता और पर्यावरण पर डालता है। यह एक खतरनाक स्थिति पैदा करता है जहां लाभ कमाने की इच्छा सुरक्षा मानकों पर भारी पड़ सकती है।
"खतरनाक उद्योगों के लिए पूर्ण दायित्व का सिद्धांत भारतीय कानून का आधार है; इस दायित्व को सीमित करने का कोई भी विधायी प्रयास सार्वजनिक सुरक्षा और पर्यावरणीय न्याय को कमजोर कर सकता है।"
सुनवाई के दौरान, अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी परमाणु आपदाओं का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि वास्तविक लागत निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक होगी। उन्होंने कहा कि यदि ऑपरेटरों को पता होगा कि उनकी वित्तीय जिम्मेदारी सीमित है, तो वे सुरक्षा उपायों में कटौती कर सकते हैं। इसके अलावा, उन्होंने AERB की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ही संस्था का नियामक और ऑपरेटर दोनों होना अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का उल्लंघन है।
बहस के दौरान ऊर्जा विकल्पों पर भी चर्चा हुई। भूषण ने डेटा पेश किया कि भारत की सौर ऊर्जा क्षमता (3,343 GW) परमाणु ऊर्जा से कहीं अधिक है। उन्होंने तर्क दिया कि सौर ऊर्जा न केवल जोखिम मुक्त है, बल्कि इसकी प्रति यूनिट लागत परमाणु ऊर्जा की तुलना में पांच गुना कम है और इसे बहुत कम समय में स्थापित किया जा सकता है।
| विशेषता | परमाणु ऊर्जा (SHANTI एक्ट) | सौर ऊर्जा (प्रस्तावित) |
|---|---|---|
| दायित्व/लायबिलिटी | सीमित (₹3,000 - ₹4,500 करोड़) | न्यूनतम/कोई बड़ी आपदा का जोखिम नहीं |
| प्रति यूनिट लागत | अधिक | परमाणु ऊर्जा का लगभग 1/5 हिस्सा |
| स्थापना समय | कई वर्ष | लगभग 3 महीने |
| जोखिम स्तर | उच्च (विकिरण/मेल्टडाउन) | बहुत कम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. SHANTI एक्ट, 2025 क्या है?
यह भारत को बदलने के लिए परमाणु ऊर्जा के टिकाऊ दोहन और उन्नति अधिनियम है, जो परमाणु ऊर्जा और उससे जुड़ी देनदारियों को नियंत्रित करता है।
2. ₹3,000 करोड़ की सीमा विवादास्पद क्यों है?
आलोचकों का कहना है कि परमाणु आपदाएं खरबों का नुकसान करती हैं, और एक छोटी सीमा ऑपरेटरों को सुरक्षा में लापरवाही बरतने के लिए प्रोत्साहित करती है।