कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक सात वर्षीय विशेष आवश्यकता वाली बच्ची की स्थायी कस्टडी उसकी माँ को सौंप दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची की देखभाल और उपचार के लिए माँ की उपस्थिति अनिवार्य है।

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने विशेष आवश्यकता वाली बच्ची की कस्टडी माँ को दी।
  • पिता को बच्चे के भरण-पोषण के लिए ₹25,000 प्रति माह देने का निर्देश।
  • अदालत ने विवाह बचाने की इच्छा से ऊपर बच्चे के कल्याण को रखा।

बच्चे के 'सर्वोत्तम हित' को प्राथमिकता देते हुए, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फरवरी 2024 के फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सात साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची की स्थायी कस्टडी उसके पिता को दी गई थी। जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस टी एम नाडाफ की पीठ ने पाया कि एक विशेष बच्ची को निरंतर देखभाल, प्यार और उपचार की आवश्यकता होती है, जो इस स्थिति में केवल माँ ही प्रदान कर सकती है।

यह मामला माँ द्वारा दायर एक अपील के बाद सामने आया। पिता ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी पत्नी के साथ फिर से जुड़ने और विवाह को बचाने की इच्छा जताई ताकि बच्ची का भविष्य सुरक्षित रहे। हालांकि, अदालत ने व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान दिया और पाया कि पिता बेंगलुरु में अकेले रहते हैं, जबकि उनका स्थायी निवास महाराष्ट्र में है, जिससे वे बच्ची की निरंतर देखभाल करने में असमर्थ हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय विकलांग बच्चों से जुड़े कस्टडी विवादों में 'कानूनी अधिकारों' के बजाय 'कार्यात्मक देखभाल' (Functional Care) को प्राथमिकता देने के न्यायिक रुझान को पुष्ट करता है। अदालत ने माँ द्वारा एक बार चिकित्सा सलाह के विपरीत बच्ची को डे-केयर में छोड़ने की घटना को कस्टडी छीनने का पर्याप्त आधार नहीं माना।

विशेष आवश्यकता वाले बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है; कानूनी कस्टडी को उसी दिशा में जाना चाहिए जहाँ सबसे निरंतर और विशेषज्ञ देखभाल उपलब्ध हो।

अदालत ने अब एक विस्तृत विज़िटेशन शेड्यूल (मिलने का समय) निर्धारित किया है ताकि पिता बच्ची के जीवन का हिस्सा बने रहें। पिता हर रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक माँ की उपस्थिति में बच्ची से मिल सकते हैं और शाम को छोटे वीडियो कॉल कर सकते हैं। साथ ही, वे चिकित्सा दौरों के दौरान माँ और बच्ची के साथ जा सकते हैं।

वित्तीय सहायता पर भी चर्चा हुई। विशेष उपचार और दवाओं के भारी खर्च को देखते हुए, उच्च न्यायालय ने मासिक भरण-पोषण राशि को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया है, ताकि बच्ची की चिकित्सा आवश्यकताओं में कोई कमी न रहे।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून में 'वेलफेयर प्रिंसिपल' (कल्याण सिद्धांत) अदालतों को सख्त कानूनी नियमों को नजरअंदाज करने की अनुमति देता है यदि बच्चे का शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य किसी अन्य व्यवस्था से बेहतर सुरक्षित हो।
विशेषताफैमिली कोर्ट आदेश (फरवरी 2024)उच्च न्यायालय आदेश (अगस्त 2026)
प्राथमिक कस्टडीपितामाँ
मासिक भरण-पोषण₹15,000₹25,000
मिलने का अधिकारस्थायी कस्टडीनिर्धारित रविवार और वीडियो कॉल

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: अदालत ने पिता की कस्टडी याचिका क्यों खारिज की?
अदालत ने पाया कि पिता बेंगलुरु में अकेले रहते हैं और एक सात वर्षीय विशेष आवश्यकता वाली बच्ची के लिए आवश्यक निरंतर देखभाल प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं।

प्रश्न 2: क्या अदालत ने इस मामले में तलाक दे दिया?
माँ ने अपनी तलाक याचिका के खारिज होने को चुनौती नहीं दी थी; यह अपील विशेष रूप से बच्ची की कस्टडी पर केंद्रित थी।