सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को 'बर्बर' बताते हुए इसे घातक इंजेक्शन से बदलने की याचिका को खारिज कर दिया है। हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार को भविष्य में इस पद्धति की समीक्षा करने का विकल्प खुला रखा है।
- सुप्रीम कोर्ट ने 1983 के 'दीना बनाम भारत संघ' मामले के फैसले को बरकरार रखा।
- याचिका में फांसी को अमानवीय और क्रूर बताते हुए घातक इंजेक्शन की मांग की गई थी।
- अदालत ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञों के माध्यम से फांसी की पद्धति की समीक्षा करने की अनुमति दी है।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मृत्युदंड के रूप में फांसी की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि फांसी एक पुरानी और दर्दनाक प्रक्रिया है, जिसे आधुनिक और कम पीड़ादायक 'लीथल इंजेक्शन' (घातक इंजेक्शन) से बदला जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 1983 के तीन जजों की बेंच द्वारा दिए गए 'दीना बनाम भारत संघ' के फैसले को एक बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान साक्ष्यों के आधार पर फांसी की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार करने का कोई ठोस कारण नहीं मिला है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा का है। वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि फांसी की प्रक्रिया में मृत्यु होने में लगभग 40 मिनट तक का समय लग सकता है, जबकि घातक इंजेक्शन से यह प्रक्रिया मात्र 5 मिनट में पूरी हो जाती है। उन्होंने फांसी को 'बर्बर और अमानवीय' करार दिया जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत है।
"संवैधानिक व्याख्या जैविक होती है और इसे वैज्ञानिक ज्ञान की प्रगति के साथ विकसित होना चाहिए।"
हालांकि कोर्ट ने याचिका खारिज की, लेकिन एक महत्वपूर्ण रास्ता खुला रखा है। पीठ ने कहा कि यदि भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सा या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आते हैं, तो इस फैसले की समीक्षा की जा सकती है। अदालत ने केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया कि वह कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और क्रिमिनोलॉजी के विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर इस पद्धति की व्यापक समीक्षा कर सकती है।
ऐतिहासिक रूप से, भारत में मृत्युदंड का उपयोग 'दुर्लभतम से दुर्लभ' (Rarest of Rare) मामलों में किया जाता है। फांसी की प्रक्रिया भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354 और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) के तहत संचालित होती है। वैश्विक स्तर पर कई देशों ने फांसी को त्यागकर इंजेक्शन पद्धति को अपनाया है, जिससे यह बहस भारत में भी तेज हो गई है।
| विशेषता | फांसी (Hanging) | घातक इंजेक्शन (Lethal Injection) |
|---|---|---|
| समय अवधि | लगभग 40 मिनट तक | लगभग 5 मिनट |
| प्रकृति | शारीरिक तनाव/दम घुटना | रासायनिक बेहोशी |
| कानूनी स्थिति (भारत) | संवैधानिक रूप से मान्य | वर्तमान में लागू नहीं |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या अब भारत में फांसी की सजा पूरी तरह खत्म हो गई है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है और इसे जारी रखने का फैसला किया है।
2. क्या भविष्य में फांसी की जगह इंजेक्शन आ सकता है?
हाँ, यदि केंद्र सरकार विशेषज्ञों की समिति के माध्यम से इसकी समीक्षा करती है और वैज्ञानिक प्रमाण मिलते हैं, तो बदलाव संभव है।