मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी के कारण पत्नी और नाबालिग बच्चे को उनके भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए 'वित्तीय उत्पीड़न' के दावों को सिरे से खारिज कर दिया।
- कोर्ट ने नाबालिग बेटे के भरण-पोषण को 3,000 रुपये से बढ़ाकर 9,000 रुपये प्रति माह किया।
- भरण-पोषण की राशि आवेदन की तिथि (30 अक्टूबर 2018) से पूर्वव्यापी (Retrospective) रूप से देय होगी।
- न्यायालय ने कहा कि लंबी कानूनी कार्यवाही के कारण आश्रितों को उनके अधिकारों से वंचित करना अन्याय होगा।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह व्यवस्था दी है कि किसी भी पत्नी या नाबालिग बच्चे को केवल इसलिए उचित भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि न्यायिक कार्यवाही लंबी खिंच गई हो। न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह की पीठ ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने भरण-पोषण राशि में वृद्धि को 'उत्पीड़न' करार दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि इंदौर के एक जोड़े का विवाह 30 जनवरी 2013 को हुआ था और उनका एक बेटा है। पत्नी ने अक्टूबर 2018 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन किया था। इंदौर फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2025 में पत्नी को 7,000 रुपये और बेटे को 3,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए नाबालिग बेटे के भरण-पोषण को बढ़ाकर 9,000 रुपये प्रति माह कर दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कोर्ट ने इस राशि को आवेदन की तिथि यानी 30 अक्टूबर 2018 से लागू करने का निर्देश दिया, जिससे पति पर पिछले कई वर्षों का बकाया भुगतान करने की जिम्मेदारी आ गई।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this judgment reinforces the Supreme Court's stance on the 'Date of Application' principle. It sends a clear signal to litigants that using procedural delays as a strategy to avoid financial obligations toward dependents will not be tolerated by the judiciary. This ensures that the basic survival and dignity of women and children are prioritized over the technicalities of legal timelines.
"भरण-पोषण का उद्देश्य केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि आश्रितों का जीवन स्तर सुनिश्चित करना है; कानूनी देरी को वित्तीय बचाव का रास्ता नहीं बनाया जा सकता।"
पति की वकील संगीता चौधरी ने तर्क दिया कि पूर्वव्यापी भुगतान से पति पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा और यह न्याय का हनन होगा। हालांकि, कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यदि भुगतान केवल वर्तमान तिथि से किया जाता, तो वास्तव में पत्नी और बच्चे को नुकसान होता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पति द्वारा अब तक भुगतान की गई अंतरिम राशि को कुल बकाया राशि में समायोजित (Adjust) किया जा सकता है, जिससे किसी भी पक्ष के साथ अनुचित व्यवहार नहीं होगा।
| विवरण | फैमिली कोर्ट का आदेश | हाई कोर्ट का संशोधित आदेश |
|---|---|---|
| पत्नी का भरण-पोषण | 7,000 रुपये/माह | 7,000 रुपये/माह (यथावत) |
| बच्चे का भरण-पोषण | 3,000 रुपये/माह | 9,000 रुपये/माह |
| भुगतान की अवधि | आदेश की तिथि से | आवेदन की तिथि (2018) से |
Frequently Asked Questions
1. पूर्वव्यापी (Retrospective) भुगतान का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि भुगतान उस तारीख से गिना जाएगा जब केस फाइल किया गया था, न कि उस तारीख से जब फैसला आया।
2. क्या पति अंतरिम भुगतान को समायोजित कर सकता है?
हाँ, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पहले से दिए गए अंतरिम भरण-पोषण को कुल बकाया राशि से घटाया जा सकता है।