मद्रास उच्च न्यायालय ने POCSO मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे बाल पीड़ितों के साथ अत्यधिक संवेदनशीलता और सहानुभूति से पेश आएं। अदालत ने न्यायिक अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है ताकि गवाही के दौरान बच्चों को मानसिक आघात न पहुंचे।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने POCSO मामलों में बाल गवाहों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया है।
- न्यायाधीशों को 'माँ द्वारा बच्चे को चाँद दिखाने' जैसी कोमलता के साथ गवाही लेनी चाहिए।
- न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की मदद लेने पर जोर दिया गया है।
- अदालत ने गवाही में होने वाली देरी और सिस्टम की विफलता पर चिंता व्यक्त की है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत संवेदनशील टिप्पणी करते हुए POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे बाल पीड़ितों के साथ अत्यधिक करुणा और धैर्य के साथ व्यवहार करें। न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती ने इस प्रक्रिया की तुलना एक माँ के उस व्यवहार से की, जो अपने बच्चे का ध्यान भटकाने के लिए उसे चाँद दिखाती है, ताकि बच्चा बिना किसी दबाव या दर्द के भोजन कर सके।
न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता की आवश्यकता
अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों का कार्य केवल साक्ष्य एकत्र करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि गवाही की प्रक्रिया बच्चे के लिए और अधिक मानसिक आघात (trauma) का कारण न बने। कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों को साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता और बच्चे की मानसिक स्थिति के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना होगा। अदालत के अनुसार, गवाह के रूप में आने वाले बच्चे की उम्र, उसकी याददाश्त और उसके मानसिक विकास को समझना अनिवार्य है।
'हमारा काम उस माँ के समान है, जो शिशु का ध्यान चाँद की ओर लगाकर उसे भोजन कराती है। जैसे एक कोमल हाथ बच्चे को बिना किसी दबाव या दर्द के चाँद दिखा देता है, उसी तरह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक सहानुभूति और देखभाल के साथ की जानी चाहिए।'
प्रशिक्षण और विशेषज्ञों की भूमिका
न्यायालय ने तमिलनाडु राज्य न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया है कि वह न्यायिक अधिकारियों के लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार करे। इसमें बाल पीड़ितों के साक्षात्कार लेने, उनके साथ तालमेल (rapport) बनाने और उनकी बातों को समझने के लिए व्यावहारिक अभ्यास शामिल होने चाहिए। अदालत ने NIMHANS द्वारा तैयार किए गए मनोवैज्ञानिक दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सामग्रियों को सभी विशेष अदालतों तक पहुँचाया जाना चाहिए।
BozokMedia विश्लेषण: क्या यह व्यवस्था में बदलाव लाएगा?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अक्सर देखा गया है कि कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और कठोर सवाल बच्चों को दोबारा डरा देते हैं। अदालत का यह निर्देश न केवल न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली को बदलेगा, बल्कि यह सुनिश्चित करेगा कि न्याय की प्रक्रिया 'पीड़ित-केंद्रित' हो, न कि केवल 'प्रक्रिया-केंद्रित'।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मामले का विवरण
यह निर्देश एक ऐसे मामले के संदर्भ में आया जिसमें 2018 में दर्ज प्राथमिकी (FIR) के सात साल बाद, यानी 2025 में, पीड़ित बच्ची की गवाही दर्ज की गई। अदालत ने इस भारी देरी को 'सिस्टम की विफलता' करार दिया। मामला आईपीसी की धारा 376 और POCSO अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था।
Frequently Asked Questions
1. मद्रास उच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों को क्या विशेष सलाह दी है?
अदालत ने सलाह दी है कि न्यायाधीश बाल पीड़ितों के साथ सहानुभूति रखें और गवाही लेते समय उन्हें मानसिक आघात से बचाने के लिए माँ की तरह कोमल व्यवहार करें।
2. न्यायिक प्रशिक्षण में क्या बदलाव किए जाएंगे?
न्यायिक अकादमी अब मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की मदद से व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित करेगी ताकि न्यायाधीश बच्चों के व्यवहार को बेहतर ढंग से समझ सकें।