पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि माँ सक्षम है, तो बच्चे की कस्टडी के मामलों में दादा-दादी की तुलना में माँ को प्राथमिकता दी जाएगी। कोर्ट ने ससुराल वालों को 5 साल के बच्चे को माँ को सौंपने का आदेश दिया है।

  • हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के कल्याण के लिए माँ की प्राथमिकता सर्वोपरि है।
  • ससुराल पक्ष द्वारा बच्चे को रखने के आरोपों के बीच कोर्ट ने माँ के पक्ष में फैसला सुनाया।
  • कोर्ट ने पुलिस को कस्टडी सुनिश्चित करने और रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।
  • माँ को दादा-दादी को बच्चे से मिलने की अनुमति देनी होगी।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए पांच साल के बच्चे के दादा-दादी को उसकी कस्टडी उसकी माँ को सौंपने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब तक माँ बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ न पाई जाए, तब तक कस्टडी के मामलों में दादा-दादी की तुलना में माँ का अधिकार प्राथमिकता पर रहेगा।

मामले के अनुसार, महिला के पति की मृत्यु दिसंबर 2025 में हुई थी। महिला का आरोप है कि पति की मृत्यु के कुछ महीनों बाद ही उसे उसके ससुराल वालों ने परेशान करना शुरू कर दिया और जून 2026 में उसे अपनी नवजात बेटी के साथ घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया, जबकि उसका पांच साल का बेटा दादा-दादी के पास ही रह गया।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला भारत में बाल कल्याण और माता-पिता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यह मामला केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं है, बल्कि यह कानूनी सिद्धांत को पुख्ता करता है कि बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) उसकी माँ के साथ रहने में निहित है, बशर्ते वह सक्षम हो।

न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि जैविक माता का अधिकार प्राकृतिक है और उसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही चुनौती दी जा सकती है।

महिला ने अदालत में दलील दी कि उसके बेटे ने स्वयं उसके साथ रहने की इच्छा व्यक्त की थी। दूसरी ओर, दादा-दादी के वकील ने आरोपों का खंडन करते हुए तर्क दिया कि बच्चा बटाला के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रहा है और उसे हटाने से उसकी पढ़ाई और भावनात्मक स्थिरता प्रभावित होगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि परिवार उस दौरान शिमला में छुट्टियां मना रहा था।

हालाँकि, अदालत ने पाया कि महिला के खिलाफ बच्चे की देखभाल न कर पाने का कोई ठोस सबूत नहीं है। अदालत ने गुरदासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को आदेश दिया कि वे कस्टडी सौंपने की प्रक्रिया सुनिश्चित करें और एक सप्ताह के भीतर अदालत को शपथ पत्र सौंपें।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय कानून में, विशेष रूप से 'गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत, अदालत हमेशा बच्चे के 'कल्याण' को सर्वोपरि मानती है। पिछले कुछ दशकों में, विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यदि माता मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ है, तो उसे बच्चे का प्राथमिक संरक्षक माना जाना चाहिए।

क्या आप जानते हैं?: 'हेबियस कॉर्पस' (Habeas Corpus) एक कानूनी रिट है जिसका उपयोग किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखने के खिलाफ किया जाता है।

Frequently Asked Questions

1. क्या दादा-दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार है?
हाँ, अदालत ने स्पष्ट किया है कि माँ को दादा-दादी को बच्चे से मिलने का उचित अवसर देना होगा।

2. अदालत कस्टडी का निर्णय किस आधार पर लेती है?
अदालत मुख्य रूप से बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक कल्याण (Welfare of the child) को आधार बनाती है।