बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की 'घोर लापरवाही' पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि 228 छात्र वन्यजीवों के खतरे के बीच बिना किसी सुरक्षित परिवहन के स्कूल जाने को मजबूर हैं। कोर्ट ने जिला कलेक्टर और वन विभाग से जवाब मांगा है।
- 228 स्कूली छात्र वन्यजीव हमलों के जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरने को मजबूर हैं।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार की कार्यप्रणाली को 'घोर उदासीनता' करार दिया है।
- कोर्ट ने जिला कलेक्टर और वन विभाग से आदेशों के उल्लंघन पर स्पष्टीकरण मांगा है।
- छात्रों को 30 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है, जिसमें कुछ को 4 घंटे पैदल चलना पड़ता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि वन्यजीवों के हमलों के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाले 228 स्कूली छात्रों की सुरक्षा के प्रति राज्य प्रशासन पूरी तरह उदासीन है। कोर्ट ने इस स्थिति को 'अत्यंत निराशाजनक' (Appalling apathy) बताते हुए जिला कलेक्टर और वन विभाग को फटकार लगाई है।
मामला को लेकर सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मिला यू देशमुख और जस्टिस नीरज पी ढोटे की पीठ ने पाया कि अप्रैल 2026 में दिए गए अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता हरीश भीमराव कांबले द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से यह मुद्दा उठाया गया था, जिसमें छात्रों के लिए सुरक्षित परिवहन और आपातकालीन चिकित्सा सहायता की मांग की गई थी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल परिवहन का नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण का है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार और शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। यदि छात्र वन्यजीवों के हमले का शिकार होते हैं, तो यह राज्य की विफलता मानी जाएगी।
'शिक्षा के लिए 30 किलोमीटर का सफर तय करना और जंगली जानवरों के बीच घंटों पैदल चलना बच्चों की सुरक्षा के साथ एक खतरनाक खिलवाड़ है।'
अदालत ने नोट किया कि एक कक्षा 6 का छात्र प्रतिदिन 4 घंटे पैदल चलकर स्कूल पहुँचता है क्योंकि कोई परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं है। याचिका में कहा गया है कि आठ गांवों के 228 छात्र पांच स्कूलों तक जाने के लिए निरंतर वन्यजीव हमलों के खतरे का सामना कर रहे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कानूनी आधार
इस मामले में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) की धारा 38V और संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि राज्य का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह वन्यजीवों और नागरिकों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। अदालत ने पहले आदेश दिया था कि जिला कलेक्टर और वन विभाग मिलकर 'रैपिड रिस्पांस टीम' (RRT) के साथ सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करें, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
अधिकारियों की जवाबदेही
कोर्ट ने जिला कलेक्टर और वन विभाग को एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो वे इस मामले पर बहुत गंभीर रुख अपनाएंगे।
Frequently Asked Questions
1. कोर्ट ने सरकार को क्या निर्देश दिए थे?
कोर्ट ने खतरनाक स्कूलों की पहचान करने और छात्रों के लिए रैपिड रिस्पांस टीम के साथ सुरक्षित परिवहन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
2. छात्रों को किन खतरों का सामना करना पड़ रहा है?
छात्रों को वन्यजीव हमलों का खतरा है और उन्हें लंबी दूरी तय करने के लिए बिना किसी सुरक्षा के पैदल चलना पड़ता है।