मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सरोगेसी के माध्यम से जन्म लेने वाले बच्चे के माता-पिता के रूप में दंपत्ति को मान्यता दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तकनीकी बाधाएं बच्चे के कल्याण और माता-पिता के अधिकारों के मार्ग में नहीं आ सकतीं।

  • मद्रास उच्च न्यायालय ने सरोगेसी दंपत्ति को बच्चे का कानूनी माता-पिता घोषित किया।
  • अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें याचिका को 'गैर-रखरखाव योग्य' बताया गया था।
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरोगेसी के माध्यम से जन्मा बच्चा दंपत्ति का जैविक बच्चा माना जाएगा।
  • बच्चे का कल्याण ही इस मामले में सर्वोच्च प्राथमिकता है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय निर्णय देते हुए सरोगेसी के माध्यम से जन्म लेने वाले बच्चे के माता-पिता के रूप में एक दंपत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान की है। न्यायमूर्ति शमीम अहमद की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि सरोगेसी के माध्यम से पैदा हुआ बच्चा दंपत्ति का जैविक बच्चा माना जाएगा और उसे वही सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो एक प्राकृतिक बच्चे को मिलते हैं।

यह मामला उस मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था, जिसने 22 अप्रैल, 2026 को दंपत्ति की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला 'सिविल प्रकृति' का है और मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र केवल आपराधिक कार्यवाही तक सीमित है। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया और कहा कि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत मजिस्ट्रेट की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित है।

कानूनी पेचीदगियों का समाधान

अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत मजिस्ट्रेट की शक्तियां केवल आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं हैं। सरोगेसी अधिनियम की धारा 4(iii)(a)(ii) मजिस्ट्रेट को माता-पिता और कस्टडी से संबंधित आदेश पारित करने का विशिष्ट वैधानिक अधिकार देती है। BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि इस तरह के निर्णय भविष्य में सरोगेसी से जुड़े कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए एक मिसाल कायम करेंगे।

बच्चे का कल्याण ही कस्टडी निर्धारित करने का सबसे महत्वपूर्ण विचार है।

मामले के तथ्यों के अनुसार, दंपत्ति ने 21 अगस्त, 2006 को शादी की थी और वर्षों के संघर्ष के बाद उन्होंने सरोगेसी का रास्ता चुना। उन्होंने सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया, जिसमें उपयुक्त प्राधिकरण से पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त करना और सरोगेट मां के लिए 36 महीने का स्वास्थ्य बीमा सुनिश्चित करना शामिल था।

Why This Matters

यह निर्णय भारत में सरोगेसी कानूनों के कार्यान्वयन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह सुनिश्चित करता है कि कानूनी प्रक्रियाओं की तकनीकी बारीकियां उन परिवारों के बीच बाधा न बनें जो माता-पिता बनने का सपना देख रहे हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य प्रक्रियात्मक शुद्धता के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना भी है।

न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया कि इस मामले में कोई भी व्यावसायिक सरोगेसी शामिल नहीं थी। अदालत ने आदेश दिया कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे की कस्टडी दंपत्ति के पास होगी और सरोगेट मां भविष्य में कस्टडी का दावा नहीं कर सकेगी।

Did You Know?: भारत में सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत, सरोगेसी के माध्यम से जन्मा बच्चा कानूनी रूप से दंपत्ति का जैविक बच्चा माना जाता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या मजिस्ट्रेट सरोगेसी के मामलों में माता-पिता के अधिकार तय कर सकता है?
हाँ, सरोगेसी अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट के पास माता-पिता और कस्टडी से संबंधित आदेश देने का वैधानिक अधिकार है।

प्रश्न 2: क्या सरोगेसी के माध्यम से जन्मा बच्चा कानूनी रूप से समान अधिकार रखता है?
जी हाँ, अदालत के अनुसार, सरोगेसी से जन्मा बच्चा दंपत्ति का जैविक बच्चा माना जाएगा और उसे प्राकृतिक बच्चे के समान सभी अधिकार मिलेंगे।