आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लिसा गिल ने कानून के छात्रों को स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने और अग्रणी बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने न्यायपालिका में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर भी प्रकाश डाला।

  • जस्टिस लिसा गिल ने DSNLU में नए गर्ल्स हॉस्टल और कॉन्फ्रेंस हॉल का उद्घाटन किया।
  • न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई है।
  • छात्रों को बाधाओं को पार कर 'पायनियर' बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

विशाखापत्तनम स्थित दामोदरम संजीवाैया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (DSNLU) के परिसर में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश और DSNLU की चांसलर, जस्टिस लिसा गिल ने शनिवार को विश्वविद्यालय का दौरा किया और शैक्षणिक बुनियादी ढांचे का विस्तार किया।

इस अवसर पर जस्टिस गिल ने नवनिर्मित गर्ल्स हॉस्टल और दो नए कॉन्फ्रेंस हॉल का उद्घाटन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के विभिन्न शैक्षणिक विभागों का दौरा किया और कक्षाओं में जाकर छात्रों के साथ संवाद किया। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे अपने शैक्षणिक जीवन की शुरुआत में ही स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करें।

न्यायपालिका में लैंगिक समानता का उदय

कानूनी पेशे में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए, जस्टिस गिल ने बताया कि न्यायपालिका में लैंगिक प्रतिनिधित्व में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने डेटा साझा करते हुए बताया कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में नामांकनों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 70% है, जबकि कई अन्य उच्च न्यायालयों में यह आंकड़ा 65% के आसपास है।

जस्टिस गिल ने कहा कि बाधाएं मौजूद हो सकती हैं, लेकिन महिलाओं को अपनी आकांक्षाओं को सीमित नहीं करना चाहिए।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, न्यायपालिका में महिलाओं की यह बढ़ती संख्या कानूनी ढांचे में अधिक समावेशी और संतुलित दृष्टिकोण लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि प्रणालीगत बाधाएं अभी भी मौजूद हैं, लेकिन जस्टिस गिल ने महिलाओं को अपने चुने हुए क्षेत्रों में 'पायनियर' यानी पथप्रदर्शक बनने के लिए प्रेरित किया।

प्रथम पीढ़ी के वकीलों और सिविल सेवा के लिए मार्गदर्शन

प्रथम पीढ़ी के वकीलों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों पर बात करते हुए, उन्होंने कहा कि कानून का पेशा कठिन हो सकता है, लेकिन दृढ़ संकल्प और निरंतरता ही सफलता की कुंजी है। इसके अलावा, उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कानून स्नातकों के लिए सिविल सेवक बनना एक उत्कृष्ट विकल्प है क्योंकि उनका कानूनी प्रशिक्षण नीति कार्यान्वयन और कानून व्यवस्था बनाए रखने में अत्यधिक सहायक होता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: कानूनी क्षेत्र में बदलाव

ऐतिहासिक रूप से, भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम रहा है। हालांकि, पिछले दो दशकों में कानूनी शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के कारण महिलाओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जो अब उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी दिखाई देने लगी है।

Did You Know?: भारत के कई उच्च न्यायालयों में अब महिला वकीलों और न्यायाधीशों की संख्या ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर पर है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: जस्टिस लिसा गिल ने DSNLU में किन सुविधाओं का उद्घाटन किया?
उत्तर: उन्होंने नए गर्ल्स हॉस्टल और दो कॉन्फ्रेंस हॉल का उद्घाटन किया।

प्रश्न 2: न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी का क्या स्तर है?
उत्तर: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में यह लगभग 70% है और अन्य कई न्यायालयों में लगभग 65% है।