बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक 17 वर्षीय छात्र के 'कोली महादेव' अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाण पत्र के दावे को बरकरार रखते हुए स्क्रूटनी कमेटी के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने कहा कि दादा के स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज 'कोली' प्रविष्टि छात्र के जनजाति दावे को खत्म नहीं कर सकती।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 वर्षीय सोलापुर के छात्र के पक्ष में फैसला सुनाया।
  • अदालत ने स्क्रूटनी कमेटी द्वारा छात्र के 'कोली महादेव' जनजाति दावे को खारिज करने के कारणों को 'अस्वीकार्य' बताया।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दादा के रिकॉर्ड में 'कोली' शब्द का उल्लेख छात्र की जनजाति पहचान को नहीं मिटा सकता।
  • विजिलेंस सेल की रिपोर्ट ने पुष्टि की कि परिवार का पारंपरिक व्यवसाय शहद और वन उत्पाद एकत्र करना था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए अनुसूचित जनजाति जांच समिति (Scrutiny Committee) को सोलापुर के एक 17 वर्षीय छात्र के पक्ष में 'कोली महादेव' अनुसूचित जनजाति वैधता प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने समिति द्वारा छात्र के दावे को खारिज करने के लिए दिए गए आधारों को पूरी तरह से गलत और तर्कहीन करार दिया है।

मामले की जड़ में छात्र के दादा के 1951 के स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज 'कोली' प्रविष्टि थी, जिसे आधार बनाकर समिति ने छात्र के ST दावे को अस्वीकार कर दिया था। हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मिला यू देशमुख और न्यायमूर्ति नीरज पी धोते की पीठ ने पाया कि समिति ने छात्र के दादा के भाई (पड़ोस के दादा) के स्कूल रिकॉर्ड को भी बिना किसी ठोस कारण के खारिज कर दिया था, जिसमें 'कोली महादेव' का उल्लेख था और वह रिकॉर्ड छेड़छाड़ से मुक्त था।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला भारत में जाति प्रमाण पत्र सत्यापन की जटिल प्रक्रियाओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या में होने वाली मानवीय त्रुटियों को उजागर करता है। यह निर्णय भविष्य में उन छात्रों के लिए एक मिसाल बनेगा जिनके पूर्वजों के दस्तावेजों में मामूली विसंगतियां होने के कारण उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या केवल एक शब्द के आधार पर नहीं, बल्कि समग्र पारिवारिक परंपराओं और साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

अदालत ने विजिलेंस सेल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि छात्र के परिवार का पारंपरिक व्यवसाय शहद और वन उत्पादों का संग्रह करना रहा है, जो 'कोली महादेव' जनजाति की पहचान के अनुरूप है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि दादा के रिकॉर्ड में 'कोली' प्रविष्टि संविधान लागू होने से पहले की होती, तो स्थिति भिन्न हो सकती थी, लेकिन वर्तमान संदर्भ में इसे छात्र के विरुद्ध उपयोग नहीं किया जा सकता।

Did You Know?: कोली महादेव जनजाति को संवैधानिक रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है और वे पारंपरिक रूप से वनों पर निर्भर रहे हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: हाईकोर्ट ने स्क्रूटनी कमेटी के फैसले को क्यों पलट दिया?
उत्तर: क्योंकि कमेटी ने छात्र के समर्थन में मौजूद विश्वसनीय दस्तावेजों को बिना किसी उचित कारण के खारिज कर दिया था और केवल एक पुराने रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लिया था।

प्रश्न 2: छात्र को अब क्या राहत मिली है?
उत्तर: अदालत ने समिति को एक सप्ताह के भीतर छात्र को 'कोली महादेव' जनजाति का वैधता प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया है।