तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने अदालतों में बलात्कार पीड़ितों के प्रति पूर्वाग्रहों पर एक नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका आज भी 'आदर्श पीड़ित' की रूढ़िवादी धारणाओं से प्रभावित है।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने तरुण तेजपाल मामले में 'आदर्श पीड़ित' की रूढ़िवादी सोच को खारिज किया।
  • कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालतें अक्सर आरोपी के कृत्य के बजाय पीड़िता के चरित्र और नैतिकता की जांच करती हैं।
  • 2013 के कानूनी संशोधनों के बावजूद, सहमति (Consent) की समझ में पितृसत्तात्मक सोच हावी है।

हाल ही में तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले ने भारतीय न्यायपालिका के भीतर गहरे बैठे पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों को उजागर किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी सर्वाइवर से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सदमे (Trauma) के प्रति एक विशिष्ट या 'मानक' तरीके से प्रतिक्रिया दे। यह फैसला उन कई निचली अदालतों के निर्णयों पर प्रहार करता है जो पीड़िता के व्यवहार को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर का तर्क है कि हालांकि 1972 के मथुरा बलात्कार मामले के बाद से सहमति की कानूनी समझ विकसित हुई है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर न्यायाधीश अभी भी व्यक्तिगत नैतिकता और लैंगिक भूमिकाओं के आधार पर निर्णय लेते हैं। उनके अनुसार, पीड़िता का जीवनशैली, उसकी पसंद, या उसके पिछले यौन संबंध अपराध की प्रकृति को प्रभावित नहीं करने चाहिए, लेकिन अदालतों में अक्सर इन्हीं बातों को मुख्य मुद्दा बनाया जाता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब न्यायपालिका 'नैतिकता' को कानूनी साक्ष्यों से ऊपर रखती है, तो यह न केवल पीड़िता के साथ अन्याय है, बल्कि यह कानून के शासन (Rule of Law) को भी कमजोर करता है। यह प्रवृत्ति समाज में यह संदेश भेजती है कि यौन हिंसा केवल उन महिलाओं के साथ होती है जो 'आदर्श' व्यवहार नहीं करतीं, जो कि पूरी तरह से गलत है।

पितृसत्ता का पूर्वाग्रह आज भी बलात्कार के मुकदमों को डराता है, जहां पीड़िता के कपड़े और जीवनशैली आरोपी के आचरण से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, भारतीय अदालतों का रिकॉर्ड चिंताजनक रहा है। 1972 के एक मामले में, जहाँ एक आदिवासी लड़की का पुलिस स्टेशन के भीतर बलात्कार हुआ था, सर्वोच्च न्यायालय ने 1979 में आरोपी पुलिसकर्मियों को यह कहकर बरी कर दिया था कि शरीर पर चोट के निशान नहीं थे, इसलिए यह एक 'शांतिपूर्ण मामला' था। यह दर्शाता है कि कैसे दशकों से 'सहमति' और 'जबरदस्ती' की व्याख्या पुरुषों के नजरिए से की गई है।

हाल के उदाहरण भी इसी दिशा में इशारा करते हैं। 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने किशोरियों को "अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण" रखने की सलाह दी थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने "अत्यंत आपत्तिजनक और अनावश्यक" करार देते हुए रद्द कर दिया। इसी तरह, 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एक सर्वाइवर के लिए यह कहना कि उसने "स्वयं मुसीबत को आमंत्रित किया", न्यायिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है।

क्या आप जानते हैं?: 2013 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम ने बलात्कार की परिभाषा का विस्तार किया और यह स्पष्ट किया कि सहमति के लिए सकारात्मक और सक्रिय सहमति अनिवार्य है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: 'आदर्श पीड़ित' (Ideal Victim) की रूढ़िवादिता क्या है?
यह वह गलत धारणा है कि एक वास्तविक बलात्कार पीड़िता को बेहद डरा हुआ, चुप और सामाजिक रूप से 'संस्कारी' होना चाहिए, अन्यथा उसकी गवाही पर संदेह किया जा सकता है।

प्रश्न 2: 2013 के संशोधन ने सहमति को कैसे परिभाषित किया?
संशोधन ने स्पष्ट किया कि सहमति का अर्थ एक स्वतंत्र इच्छा के साथ दिया गया सकारात्मक समझौता है, न कि केवल विरोध की कमी।