सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुशार मेहता ने कहा कि तेजपाल को अपील दायर करने से पहले जेल में आत्मसमर्पण करना चाहिए। गोवा सरकार ने इस बात को कोर्ट में उजागर किया, जबकि अभियोजक व प्रतिवादी दोनों ने अलग‑अलग तर्क पेश किए।
- सुप्रीम कोर्ट ने आदेश XX नियम 3 के तहत आत्मसमर्पण को अनिवार्य बताया।
- गोवा सरकार का तर्क है कि तेजपाल को पहले सत्र में आत्मसमर्पण करना चाहिए था।
- हाई कोर्ट ने चार‑सप्ताह की समयसीमा दी थी, पर यह अपील में विवाद का मुद्दा बना।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का सार
नई दिल्ली – 24 अगस्त 2026 को एकल जज बेंच के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुशार मेहता ने तर्क दिया कि पूर्व संपादक‑इन‑चीफ तरुण तेजपाल को अपील दायर करने से पहले आत्मसमर्पण करना आवश्यक है। यह बयान गोवा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत किया, जहाँ तेजपाल को 2013 में एक महिला पत्रकार के साथ यौन उत्पीड़न का अपराध सिद्ध हुआ था और 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
केस का पृष्ठभूमि
तेजपाल पर 2013 में दो अलग‑अलग घटनाओं में यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। 2021 में गोवा के मैपुसा में अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया, यह कहते हुए कि पीड़िता ने “कोई सामान्य व्यवहार नहीं दिखाया” जो यौन अत्याचार के शिकार में दिखना चाहिए। बाद में हाई कोर्ट ने इस फैसले को उलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के व्यवहार को “स्टीरियोटाइपिकल” मानने की गलती की थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सॉलिसिटर जनरल का तर्क
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नियम 2013 के आदेश XX नियम 3 अनिवार्य हैं और तब तक अपील सूचीबद्ध नहीं की जा सकती जब तक अपीलकर्ता आत्मसमर्पण नहीं करता। उन्होंने दो‑जज बेंच के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान को अनिवार्य माना गया है।
रक्षा पक्ष का विरोध
तेजपाल के वकील कपिल सिबाल ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने उन्हें चार‑सप्ताह की विंडो दी थी, इसलिए आत्मसमर्पण अनावश्यक है। उन्होंने कहा, “यदि कोर्ट ने स्टे दिया है तो इस नियम का प्रयोग नहीं किया जा सकता।” सिबाल ने यह भी कहा कि यदि हाई कोर्ट ने स्टे नहीं दिया होता तो उन्हें जेल जाना पड़ता, और आत्मसमर्पण के बाद अपील करना व्यर्थ होगा।
कोर्ट का निर्णय
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद, जज अलोक अराधे ने कहा कि सिबाल ने आत्मसमर्पण से संबंधित आवेदन के मूलभूत पहलुओं को नहीं छुआ है। अदालत ने इस मध्यस्थ आवेदन को 25 अगस्त 2026 को सुनने के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that इस निर्णय से भविष्य में कई उच्च‑स्तरीय अपराधियों को आत्मसमर्पण के बिना अपील दायर करने से रोका जा सकता है, जिससे न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती बढ़ेगी।
“आत्मसमर्पण को अनिवार्य बनाकर न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि सजा का पालन हो और अपील प्रक्रिया में देरी न हो।” – डॉ. अजय मेहता, कानूनी विशेषज्ञ
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: आदेश XX नियम 3 क्या है?
उत्तर: यह सुप्रीम कोर्ट का एक नियम है जो कहता है कि दोषी को आत्मसमर्पण करना अनिवार्य है, अन्यथा उसकी अपील स्वीकार नहीं की जा सकती।
प्रश्न 2: यदि तेजपाल आत्मसमर्पण नहीं करते तो क्या होगा?
उत्तर: अदालत उनके खिलाफ अतिरिक्त दंड या जेल में अतिरिक्त अवधि जारी कर सकती है, और अपील प्रक्रिया स्थगित रह सकती है।