मद्रास उच्च न्यायालय ने 26 वर्षों से अलग रह रहे एक जोड़े के विवाह को समाप्त कर दिया है, लेकिन पति को पत्नी के प्रति वित्तीय और संपत्ति संबंधी दायित्वों को पूरा करने का आदेश दिया है।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने 26 साल के लंबे अलगाव के बाद विवाह को भंग करने का निर्णय लिया।
- अदालत ने पति के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और बेटियों के प्रति उपेक्षा पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
- तलाक की डिक्री तभी प्रभावी होगी जब पति पत्नी को संपत्ति और वित्तीय बकाया का भुगतान करेगा।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए उस विवाह को समाप्त कर दिया है जिसमें पति-पत्नी पिछले 26 वर्षों से अलग रह रहे थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस लंबे अलगाव के बाद अब सुलह या पुनर्मिलन की कोई संभावना शेष नहीं बची है। हालांकि, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि तलाक केवल तभी मान्य होगा जब पति अपनी पत्नी के प्रति संपत्ति और वित्तीय दायित्वों को पूरा करेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 1995 में हुए एक 'आत्म-सम्मान विवाह' (Self-Respect Marriage) से जुड़ा है। पति और पत्नी की दो बेटियां हैं, लेकिन अदालत ने पाया कि पति ने अपनी बेटियों की शिक्षा या विवाह के लिए एक पैसा भी खर्च नहीं किया। इतना ही नहीं, जब बेटियों की शादियां हुईं, तब भी पिता उनकी खुशियों में शामिल नहीं था। पति ने अपनी पत्नी के चरित्र पर भी निराधार आरोप लगाए थे, जिसके लिए उसे बाद में अदालत में माफी मांगनी पड़ी।
अदालत का सख्त रुख
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की पीठ ने पति के व्यवहार की कड़ी निंदा की। अदालत ने कहा कि एक जिम्मेदार पारिवारिक व्यक्ति के रूप में पति ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। पति ने वर्ष 1999 में घर छोड़ दिया था और 2000 में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे पारिवारिक अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।
अदालत ने माना कि इतने लंबे अलगाव के बाद वैवाहिक बंधन को जीवित रखने का कोई औचित्य नहीं है, बशर्ते वित्तीय न्याय सुनिश्चित किया जाए।
संपत्ति और वित्तीय शर्तें
अदालत ने तलाक की डिक्री को प्रभावी करने के लिए निम्नलिखित शर्तें रखी हैं:
- पति को संयुक्त रूप से धारित पांच सेंट की संपत्ति के लिए पत्नी के पक्ष में एक 'रिलीज़ डीड' निष्पादित करनी होगी।
- पति को अपनी 1.7 सेंट की पैतृक संपत्ति की बिक्री राशि का दो-तिहाई हिस्सा पत्नी को देना होगा।
- पति को पत्नी के भरण-पोषण के बकाया (Maintenance arrears) का भुगतान करना होगा।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायपालिका केवल कानूनी संबंधों को समाप्त नहीं करती, बल्कि यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि कमजोर पक्ष, विशेषकर महिलाएं, आर्थिक रूप से सुरक्षित रहें।
निष्कर्ष
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पति की उम्र लगभग 63 वर्ष और पत्नी की लगभग 56 वर्ष है। इस उम्र और दो दशकों से अधिक के अलगाव को देखते हुए, अदालत ने वैवाहिक बंधन को बनाए रखने के किसी भी उद्देश्य को निरर्थक माना।
Frequently Asked Questions
1. अदालत ने तलाक को शर्तों के साथ क्यों रखा?
अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए शर्तें रखीं कि पति अपनी पत्नी के प्रति संपत्ति और वित्तीय दायित्वों को पूरा करे, क्योंकि उसने वर्षों तक उसका साथ नहीं दिया था।
2. 'आत्म-सम्मान विवाह' क्या है?
तमिलनाडु संशोधन अधिनियम के तहत, यह एक ऐसा विवाह है जिसमें पुरोहितों या जटिल अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती और इसे रिश्तेदारों या मित्रों की उपस्थिति में संपन्न किया जाता है।