गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक CRPF जवान की बलात्कार की सजा को बरकरार रखा है, जिसमें अदालत ने माना कि पारिवारिक संबंधों और मानसिक आघात के कारण पीड़िता अपनी आपबीती बताने में असमर्थ थी।
- गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने CRPF जवान की बलात्कार की सजा को बरकरार रखा।
- अदालत ने माना कि पारिवारिक करीबी रिश्तों के कारण पीड़िता ने समय पर खुलासा नहीं किया।
- पीड़िता ने मुकदमे के दौरान गवाही देने के बाद आत्महत्या कर ली थी।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) कर्मी की बलात्कार की सजा को बरकरार रखा है। यह मामला एक 21 वर्षीय युवती से जुड़ा है, जिसने आरोपी को 'चाचा' कहकर संबोधित किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता के और आरोपी के बीच गहरे पारिवारिक संबंधों और उसके द्वारा झेले गए मानसिक आघात ने उसे इस जघन्य अपराध का खुलासा करने से रोका।
न्यायमूर्ति मितली ठकुरिया ने आरोपी CRPF जवान की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत अपनी सजा को चुनौती दी थी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि चिकित्सा साक्ष्यों में चोटों की कमी है और प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में देरी हुई है, लेकिन अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया।
मामले की विस्तृत पृष्ठभूमि
यह घटना 2021 की है, जब पीड़िता आरोपी के बेटे के जन्मदिन समारोह में शामिल हुई थी। समारोह के बाद, वह आरोपी की नई कार में अपने चचेरे भाई, आरोपी की बेटी और ड्राइवर के साथ जा रही थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने कार को एक सुनसान इलाके में मोड़ दिया। जब ड्राइवर कुछ सामान खरीदने गया, तब आरोपी ने पीड़िता के साथ यौन शोषण किया।
पीड़िता का चचेरा भाई कार के अंदर था, जहाँ तेज़ संगीत बज रहा था, इसलिए उसने हमला नहीं देखा, लेकिन बाद में पीड़िता को रोते हुए देखा। घर लौटने के बाद, युवती गहरे सदमे में चली गई और कई दिनों तक चुप रही। अंततः, उसने आत्महत्या का प्रयास किया, जिसके बाद अस्पताल में उसने अपने माता-पिता को पूरी सच्चाई बताई।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जहाँ केवल मेडिकल रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य नहीं माना जाता। अक्सर यौन हिंसा के मामलों में, विशेषकर जब अपराधी परिवार का सदस्य हो, पीड़िता सामाजिक दबाव और मानसिक आघात के कारण तुरंत रिपोर्ट नहीं कर पाती। यह निर्णय इस बात को मान्यता देता है कि 'देरी' का मतलब 'झूठ' नहीं होता।
"यौन अपराधों में पीड़िता की विश्वसनीयता केवल भौतिक साक्ष्यों पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों और मानसिक स्थिति के विश्लेषण पर आधारित होनी चाहिए।"
अदालत ने नोट किया कि पीड़िता ने मुकदमे में गवाही देने के बाद अत्यधिक मानसिक पीड़ा के कारण अपना जीवन समाप्त कर लिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह अपने परिवार के साथ अच्छे संबंधों वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाए।
| बचाव पक्ष का तर्क | अदालत का निष्कर्ष |
|---|---|
| FIR दर्ज करने में देरी हुई | पारिवारिक रिश्तों और सदमे के कारण देरी जायज है |
| मेडिकल रिपोर्ट में चोटें नहीं थीं | चोटों की अनुपस्थिति बलात्कार के दावे को खारिज नहीं करती |
| गवाही में विसंगतियां थीं | परिस्थितिजन्य साक्ष्य और गवाहों के बयान विश्वसनीय हैं |
Frequently Asked Questions
1. क्या मेडिकल रिपोर्ट में चोट न होना आरोपी को बरी करने का आधार है?
नहीं, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा साक्ष्यों में चोटों की कमी का मतलब यह नहीं है कि अपराध नहीं हुआ।
2. आरोपी को कितनी सजा सुनाई गई थी?
ट्रायल कोर्ट ने जून 2022 में आरोपी को 10 साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।