सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि भारत में महिलाओं के लिए कानूनी ढांचा तो मजबूत है, लेकिन न्याय प्रणाली के प्रभावी कार्यान्वयन में भारी कमी है। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में सुधार और महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुख्य बातें
- भारत में महिलाओं के लिए कानून तो हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है।
- न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों के दोबारा उत्पीड़न (revictimisation) को रोकना अनिवार्य है।
- कर्नाटक के नए संशोधन महिलाओं के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन बना रहे हैं।
- कानूनी सहायता तत्काल पुलिस स्टेशनों या अस्पतालों में प्रदान की जानी चाहिए।
बेंगलुरु में आयोजित 'महिलाओं के लिए न्याय' विषय पर दक्षिण क्षेत्र सम्मेलन के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने एक महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हालांकि भारत ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी ढांचा तैयार कर लिया है, लेकिन न्याय वितरण प्रणाली (justice delivery system) के प्रभावी कार्यान्वयन में हम अभी भी पीछे हैं।
न्यायाधीश नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "कानून का वादा लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन उसका वितरण अपर्याप्त बना हुआ है।" उन्होंने कहा कि समाज की मानसिकता और दृष्टिकोण बदलने के लिए न्याय वितरण प्रणाली में प्रणालीगत बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि न्याय की धीमी गति और सामाजिक रूढ़िवादिता महिलाओं को कानूनी लड़ाई लड़ने से हतोत्साहित करती है। जब तक कानूनी सहायता तत्काल उपलब्ध नहीं होगी, तब तक कानून केवल कागजों तक सीमित रहेगा।
न्यायिक अधिकारियों को साक्ष्य दर्ज करते समय और निर्णय देते समय उपयोग की जाने वाली भाषा के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल की आवश्यकता है।
न्यायाधीश ने कर्नाटक के हालिया नागरिक न्यायालय संशोधनों की भी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि अपील के अधिकार को जिला न्यायालय तक सीमित करने से महिलाओं के लिए न्याय पाना महंगा और कठिन हो जाएगा, क्योंकि उन्हें मजबूरन सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. न्यायाधीश नागरत्ना ने कानूनी सहायता के बारे में क्या सुझाव दिया?
उन्होंने सुझाव दिया कि घरेलू हिंसा या दहेज उत्पीड़न जैसी घटनाओं के तुरंत बाद पुलिस स्टेशनों या अस्पतालों में ही कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
2. कर्नाटक के नए कानून से महिलाओं को क्या नुकसान है?
नए संशोधनों के कारण अपील का अधिकार सीमित हो गया है, जिससे महिलाओं के लिए संपत्ति जैसे विवादों में न्याय पाना महंगा और कठिन हो जाएगा।