बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक पति की याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 10 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आय का निर्धारण बिना सबूत के केवल 'अंदाजे' के आधार पर नहीं किया जा सकता।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 10 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते के आदेश को पलट दिया।
- अदालत ने कहा कि पति की आय का आकलन बिना सबूत के केवल उसकी योग्यता के आधार पर करना गलत है।
- मामले को फिर से निर्धारण के लिए पुणे फैमिली कोर्ट वापस भेजा गया है।
- बेटी के लिए 10,000 रुपये मासिक रखरखाव जारी रहेगा।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए 10 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते (Permanent Alimony) के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह फैसला "असमर्थित धारणाओं" पर आधारित था। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष चव्हाण की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की केवल शैक्षणिक योग्यता या पिछले कार्य अनुभव के आधार पर उसकी वर्तमान आय का अनुमान लगाना कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
यह मामला तब शुरू हुआ जब एक पति ने पुणे फैमिली कोर्ट के अक्टूबर 2025 के फैसले को चुनौती दी। फैमिली कोर्ट ने पति द्वारा क्रूरता के आधार पर दायर तलाक की याचिका को स्वीकार किया था, लेकिन साथ ही पत्नी को 10 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता और नाबालिग बेटी के लिए 10,000 रुपये मासिक रखरखाव देने का आदेश दिया था।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारतीय पारिवारिक कानूनों में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। अक्सर गुजारा भत्ता तय करते समय अदालतें 'क्षमता' (Capacity) और 'वास्तविक आय' (Actual Income) के बीच भ्रमित हो जाती हैं। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय दायित्वों का निर्धारण केवल ठोस साक्ष्यों, संपत्ति और देनदारियों के विवरण (Affidavit of Assets and Liabilities) के आधार पर होना चाहिए, न कि न्यायाधीश के व्यक्तिगत अनुमान पर।
"न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्य सर्वोपरि हैं; योग्यता आय का संकेत हो सकती है, लेकिन वह आय का कानूनी प्रमाण नहीं हो सकती।"
अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने केवल इस आधार पर मान लिया था कि चूंकि पति कुशल है और उसने जर्मनी में काम किया है, इसलिए उसकी आय 1 लाख रुपये प्रति माह होनी चाहिए। हाई कोर्ट ने इसे 'गेस वर्क' (Guesswork) करार दिया और निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट अब दोनों पक्षों की वास्तविक आय, जरूरतों, संपत्तियों और देनदारियों का विस्तृत विवरण लेकर नए सिरे से निर्णय ले।
हालांकि, कोर्ट ने मानवीय आधार पर यह आदेश दिया कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक पति अपनी नाबालिग बेटी के लिए 10,000 रुपये मासिक रखरखाव देना जारी रखेगा, जिसे बाद के फैसले में समायोजित किया जा सकता है।
Frequently Asked Questions
1. क्या योग्यता के आधार पर गुजारा भत्ता तय किया जा सकता है?
नहीं, बॉम्बे हाई कोर्ट के अनुसार, केवल योग्यता या पिछले अनुभव के आधार पर आय का अनुमान लगाकर गुजारा भत्ता तय नहीं किया जा सकता; इसके लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
2. क्या बेटी का रखरखाव भी रद्द कर दिया गया?
नहीं, कोर्ट ने नाबालिग बेटी के लिए 10,000 रुपये मासिक रखरखाव जारी रखने का आदेश दिया है।