अहमदाबाद में एक बस कंडक्टर पर एसिड हमले की दोषी महिला को गुजरात हाई कोर्ट ने जमानत दे दी है। अदालत ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज में आरोपी का चेहरा स्पष्ट नहीं था और सबूतों में गंभीर खामियां थीं।

  • गुजरात हाई कोर्ट ने एसिड अटैक की दोषी माहेज़बीनबानु छुवारा की 10 साल की सजा निलंबित की।
  • अदालत ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज में बुर्के के कारण हमलावर का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
  • पुलिस द्वारा कथित तौर पर पहने गए कपड़े, दस्ताने और एसिड के कैन को जब्त न करना मामले में बड़ी चूक माना गया।

अहमदाबाद स्थित गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस महिला की 10 साल की कैद की सजा को निलंबित कर दिया है, जिसे एक बस कंडक्टर पर तेजाब हमले का दोषी ठहराया गया था। जस्टिस विमल के. व्यास ने यह आदेश देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष हमलावर की पहचान को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

मामले के अनुसार, 42 वर्षीय माहेज़बीनबानु छुवारा पर आरोप था कि उसने अहमदाबाद नगर निगम परिवहन सेवा (AMTS) के कंडक्टर राकेश ब्रह्मभट्ट (51) पर 'ईर्ष्या और द्वेष' के कारण हमला किया। आरोप था कि ब्रह्मभट्ट ने उनके साथ संबंध तोड़ लिए थे, जिसके बाद उन्होंने उन पर तेजाब फेंक दिया। निचली अदालत ने उन्हें 10 साल के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

सबूतों का अभाव और कानूनी खामियां

हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई गंभीर अंतराल थे। अदालत ने नोट किया कि सीसीटीवी फुटेज में केवल एक बुर्के में लिपटी आकृति दिखाई दे रही थी, जिससे यह तय करना मुश्किल था कि वह व्यक्ति पुरुष था या महिला। स्वयं पीड़ित राकेश ब्रह्मभट्ट ने भी स्वीकार किया कि वह निश्चितता के साथ नहीं कह सकते कि फुटेज में दिख रहा व्यक्ति कौन था।

"जब पहचान का आधार केवल एक ढका हुआ चेहरा हो और भौतिक साक्ष्य अनुपस्थित हों, तो न्यायशास्त्र के अनुसार संदेह का लाभ आरोपी को मिलना अनिवार्य है।"

इसके अलावा, जांच अधिकारी ईश्वरभाई गमित की गवाही से यह स्पष्ट हुआ कि पुलिस ने आरोपी द्वारा पहने गए कपड़े और दस्ताने जब्त नहीं किए थे। यहाँ तक कि उस प्लास्टिक कैन को भी बरामद नहीं किया गया जिसमें तेजाब रखा गया था। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि छुवारा और ब्रह्मभट्ट के बीच किसी भी तरह के संबंध का कोई डिजिटल प्रमाण (जैसे व्हाट्सएप चैट या कॉल रिकॉर्ड) मौजूद नहीं है।

BozokMedia विश्लेषण: यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia analysis shows कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली में 'साक्ष्य की श्रृंखला' (Chain of Evidence) के महत्व को रेखांकित करता है। अक्सर भावनात्मक आवेश में की गई गिरफ्तारियों में पुलिस भौतिक साक्ष्यों (Physical Evidence) की अनदेखी कर देती है, जिसका लाभ बाद में आरोपियों को कानूनी रूप से मिल जाता है। यह फैसला दर्शाता है कि केवल चश्मदीद गवाहों के बयान पर्याप्त नहीं हैं यदि वे विरोधाभासी हों।

अदालत ने पीड़ित के बेटे ओम की गवाही में भी विरोधाभास पाया। जहाँ अभियोजन ने कहा कि पीड़ित को तुरंत GCS अस्पताल ले जाया गया, वहीं मेडिकल ऑफिसर के रिकॉर्ड में यह उल्लेख था कि उन्हें उनके भाई द्वारा रेफरल नोट के साथ लाया गया था।

strong>क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून में 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि किसी निर्दोष को सजा न मिले, भले ही आरोपी के दोषी होने की संभावना अधिक हो, जब तक कि सबूत पुख्ता न हों।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या महिला को पूरी तरह बरी कर दिया गया है?
नहीं, केवल उसकी सजा को निलंबित किया गया है और जमानत दी गई है। उसकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील अभी भी लंबित है।

प्रश्न 2: जमानत की शर्तें क्या हैं?
अदालत ने 15,000 रुपये के बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त रखी है, साथ ही उसे बिना अनुमति भारत छोड़ने से मना किया गया है।