हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा महिला को पुनर्विवाह तक भरण-पोषण पाने का अधिकार है ताकि वह निराश्रित न हो। अदालत ने कहा कि केवल तलाक की डिक्री पति को उसकी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती।

  • तलाकशुदा पत्नियों को पुनर्विवाह होने तक भरण-पोषण का अधिकार है।
  • CrPC की धारा 125 का उद्देश्य महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है।
  • अदालत ने पति के इस तर्क को खारिज कर दिया कि तलाक के बाद भरण-पोषण की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।

लैंगिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक तलाकशुदा महिला के पक्ष में भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि भरण-पोषण के प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि एक महिला गरिमा के साथ जी सके और उसे "निराश्रित या भिखारी" बनने के लिए मजबूर न होना पड़े। यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि विवाह टूटने के बाद महिलाओं को अत्यधिक गरीबी में जाने से रोकना न्यायपालिका की प्राथमिकता है।

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की पीठ ने की। पीठ ने पाया कि एक तलाकशुदा पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार तब तक पूर्ण है जब तक वह अविवाहित रहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार को तब तक कम नहीं किया जा सकता जब तक कि महिला किसी कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त अयोग्यता की श्रेणी में न आती हो।

कानूनी विवाद और पृष्ठभूमि

यह विवाद एक ऐसे जोड़े से जुड़ा है जिनकी शादी 21 दिसंबर, 1997 को हुई थी और उनके तीन बच्चे हैं। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उसे 2009 में ससुराल से बाहर निकाल दिया गया। मई 2019 में, उसने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। महिला का दावा था कि उसके पूर्व पति एक ठेकेदार हैं और महीने के 30,000 रुपये कमाते हैं, जबकि पति ने खुद को एक आकस्मिक मजदूर बताया।

फैमिली कोर्ट ने पति की मासिक आय 11,250 रुपये आंकी थी और पत्नी को 4,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। 22 नवंबर, 2021 को क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) होने के बाद, पति ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि तलाक ने उसकी वित्तीय जिम्मेदारी को समाप्त कर दिया है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय उन पतियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो वित्तीय जिम्मेदारी से बचने के लिए तलाक को एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की कोशिश करते हैं। भरण-पोषण को केवल "वैवाहिक स्थिति" के बजाय "मानवीय गरिमा" से जोड़कर, अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि कानूनी अलगाव के बाद महिलाएं असुरक्षित न रहें।

"जीवनसाथी के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व सामाजिक न्याय में निहित है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को तलाक के बाद सड़कों पर न आना पड़े।"

अदालत ने कहा कि किसी भी शारीरिक अक्षमता के प्रमाण के बिना, केवल खोखले बहाने कानून में स्वीकार्य नहीं हैं। एक स्वस्थ और कमाने में सक्षम पुरुष अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। अदालत ने 4,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण को बरकरार रखा और पति को निर्देश दिया कि वह बकाया राशि का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करे।

क्या आप जानते हैं?: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है, जिसका अर्थ है कि यह सभी नागरिकों पर लागू होता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या तलाक की डिक्री भरण-पोषण के भुगतान को रोकती है?
नहीं, इस फैसले के अनुसार, एक तलाकशुदा पत्नी को तब तक भरण-पोषण का अधिकार है जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती।

प्रश्न 2: CrPC की धारा 125 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य पत्नियों, बच्चों और माता-पिता को त्वरित तरीके से भरण-पोषण प्रदान करना है ताकि वे निराश्रित न हों।