कृष्णा जिले में ऑटो चालक द्वारा कथित यौन शोषण की शिकार दो नाबालिग छात्राओं ने स्कूल जाना बंद कर दिया है और उनके परिवार ने सरकारी सहायता लेने से मना कर दिया है।

  • कृष्णा जिले के माचलीपट्टनम में दो कक्षा 8 की छात्राओं के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया गया।
  • आरोपी ऑटो चालक और उसका साथी पुलिस की गिरफ्त में हैं।
  • पीड़ितों ने सरकारी मुआवजा और कानूनी सहायता लेने से लिखित में इनकार कर दिया है।
  • घटना के बाद से दोनों बच्चियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है।

आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले से एक हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहाँ यौन शोषण की शिकार दो नाबालिग छात्राएं गहरे मानसिक आघात में हैं। माचलीपट्टनम के बाहरी इलाके में स्थित एक स्कूल हॉस्टल से भागने वाली कक्षा 8 की इन दो छात्राओं के साथ एक ऑटो चालक और उसके साथी ने कथित तौर पर दुष्कर्म किया। इस घटना के बाद से न केवल बच्चियों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है, बल्कि उनके परिवार ने सरकार द्वारा दी जाने वाली किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता या मुआवजे को लेने से भी स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है।

घटना का विवरण

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 6 अगस्त 2026 को हुई थी। दोनों छात्राएं अपने हॉस्टल से निकलकर माचलीपट्टनम के कोनेरु सेंटर पहुंची थीं। वहां उन्होंने एक राहगीर के मोबाइल से अपने माता-पिता को फोन कर ₹100 मांगे। जब माता-पिता ने स्कूल प्रिंसिपल से संपर्क किया, तो पता चला कि बच्चियां लापता हैं। इसी दौरान एम. वंशी किरण नामक ऑटो चालक और उसके दोस्त के. सिद्धू ने उन्हें घर छोड़ने का झांसा देकर अपनी ऑटो में बिठा लिया और रुद्रावरम गांव के पास एक निर्माणाधीन इमारत में ले जाकर उनके साथ दरिंदगी की।

कानूनी कार्रवाई और वर्तमान स्थिति

सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस वी. विद्यासागर नायडू ने बताया कि बंदर तालुका पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ 'पॉक्सो' (POCSO) अधिनियम, 2012 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, कानूनी कार्रवाई के बावजूद, पीड़ितों का सामाजिक और मानसिक अलगाव एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में यौन हिंसा के पीड़ितों के प्रति व्याप्त सामाजिक कलंक (stigma) को भी उजागर करता है। जब पीड़ित और उनके परिवार सरकारी मदद से इनकार करते हैं, तो यह दर्शाता है कि वे समाज के डर या अत्यधिक शर्म से जूझ रहे हैं, जो उनके पुनर्वास की राह में सबसे बड़ी बाधा है।

पीड़ितों का मुआवजा और सहायता से इनकार करना समाज में व्याप्त गहरे मानसिक आघात और सामाजिक बहिष्कार के डर का संकेत है।

महिला विकास और बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों के अनुसार, परिवारों ने लिखित में दिया है कि वे न तो वित्तीय सहायता लेंगे और न ही जांच में सहयोग करेंगे। आंध्र प्रदेश राज्य बार फेडरेशन की मानवाधिकार सचिव पेंडम राज्य लक्ष्मी ने मांग की है कि प्रशासन को इन बच्चियों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष परामर्श और कानूनी सहायता प्रदान करनी चाहिए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम को बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए कड़े प्रावधानों के साथ लागू किया गया है। हालांकि, मामलों के निपटारे और पीड़ितों के सामाजिक पुनर्वास की दर अभी भी एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है, जैसा कि इस मामले में देखा जा सकता है।

Did You Know?: पॉक्सो अधिनियम के तहत, पीड़िता की पहचान उजागर करना एक दंडनीय अपराध है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: आरोपियों पर कौन सी धाराएं लगाई गई हैं?
उत्तर: आरोपियों पर पॉक्सो (POCSO) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

प्रश्न 2: क्या सरकार पीड़ितों की मदद कर रही है?
उत्तर: हाँ, सरकार सहायता की पेशकश कर रही है, लेकिन परिवारों ने लिखित रूप में इसे अस्वीकार कर दिया है।