मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि केवल विवाहित होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार की भेदभावपूर्ण नीति को असंवैधानिक करार दिया है।
- मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने विवाहित बेटियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
- कोर्ट ने राज्य की अनुकंपा नियुक्ति नीति के भेदभावपूर्ण क्लॉज को असंवैधानिक माना।
- विवाह की स्थिति के आधार पर नियुक्ति से इनकार करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
- न्यायालय ने विभाग को तीन महीने के भीतर मामले पर पुनरावलोकन करने का निर्देश दिया।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी बेटी को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) देने से मना नहीं किया जा सकता कि उसके पिता की मृत्यु के समय वह विवाहित थी। न्यायमूर्ति दीपक खोट की पीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें विवाहित बेटियों को इस लाभ से बाहर रखा गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शश प्रभा नामक महिला की याचिका से जुड़ा है, जिनके पिता 2007 में एक सरकारी मिडिल स्कूल में हेडमास्टर के पद पर कार्यरत थे। शश प्रभा के पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। हालांकि, विभाग ने उनके आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया कि पिता की मृत्यु के समय वह विवाहित थीं, और बाद में उनका तलाक हो गया था।
शश प्रभा ने बताया कि उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया था और वह अपने पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर थीं। उन्होंने लोक अदालत के माध्यम से कानूनी रूप से तलाक की डिक्री भी प्राप्त की थी, फिर भी विभाग ने उनके दावों को बार-बार ठुकराया।
कानूनी विश्लेषण और संवैधानिक अधिकार
न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य की अनुकंपा नियुक्ति नीति का क्लॉज 2.2, जो विवाहित बेटियों को विचार के अधिकार से वंचित करता है, न्यायिक जांच में टिक नहीं सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
विवाहित होने की स्थिति में बेटी को अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का सीधा उल्लंघन है।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय लैंगिक न्याय (Gender Justice) की दिशा में एक मील का पत्थर है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि नीति के तहत एक जीवित जीवनसाथी बिना किसी शर्त के बेटे को नामांकित कर सकता है, लेकिन बेटियों के लिए 'अविवाहित' होने की शर्त लगाना समानता के अधिकार के विरुद्ध है।
क्यों यह फैसला महत्वपूर्ण है?
यह निर्णय उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो अपने परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2020 के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी नीतियों को संविधान के अनुच्छेद 15(1) (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 16(1) (अवसर की समानता) के अनुरूप होना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या विवाहित बेटी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार है?
हाँ, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के नवीनतम फैसले के अनुसार, केवल विवाहित होने के आधार पर किसी बेटी को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
2. न्यायालय ने सरकार को क्या निर्देश दिया है?
न्यायालय ने विभाग को निर्देश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर महिला के आवेदन पर नई नीतिगत दिशा-निर्देशों के तहत फिर से विचार करे।