सुप्रीम कोर्ट ने CJP के नेतृत्व वाले परीक्षा विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी FIR को रद्द करने के लिए अनुच्छेद 142 का उपयोग किया है। यह निर्णय न्याय प्रणाली में इस विशेष शक्ति के उपयोग और इसकी सीमाओं पर एक गंभीर कानूनी बहस छेड़ता है।
- सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश दिया।
- न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग 'पूर्ण न्याय' करने के लिए किया।
- NEET-UG 2026 लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजे का निर्देश दिया गया।
- अनुच्छेद 142 की व्याख्या और इसके व्यापक उपयोग पर कानूनी विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं।
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए राष्ट्रव्यापी परीक्षा विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह आदेश दिया। न्यायालय ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन को स्वीकार कर लिया कि वह इन मामलों को आगे नहीं बढ़ाएगी।
इस आदेश के तहत, लगभग 2,873 व्यक्तियों को छोड़कर, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक इतिहास होने का संदेह है, सभी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही, न्यायालय ने NEET-UG 2026 परीक्षा लीक मामले में आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को तीन महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है।
अनुच्छेद 142 क्या है और इसका इतिहास क्या है?
संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को वह 'डिक्री या आदेश' पारित करने की शक्ति देता है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो। दिलचस्प बात यह है कि संविधान में 'पूर्ण न्याय' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे न्यायाधीशों को व्यापक विवेकाधीन शक्तियां मिलती हैं।
इस प्रावधान की जड़ें 1935 के भारत सरकार अधिनियम की धारा 210 में देखी जा सकती हैं। संविधान सभा द्वारा 27 मई, 1949 को इसे अपनाया गया था। ऐतिहासिक रूप से, इसका उपयोग तब किया जाता था जब लिखित कानून किसी विवाद के समाधान में मौन होता था, ताकि न्याय, साम्य और अच्छे विवेक के आधार पर निर्णय लिया जा सके।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि अनुच्छेद 142 का उपयोग न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है। जहाँ एक ओर यह न्यायालय को जटिल कानूनी रिक्तियों को भरने की शक्ति देता है, वहीं दूसरी ओर यह 'कानून के शासन' (Rule of Law) के लिए चुनौती भी बन सकता है यदि इसका उपयोग विधायी प्रक्रियाओं को दरकिनार करने के लिए किया जाए।
अनुच्छेद 142 एक दोधारी तलवार है; यह न्याय सुनिश्चित करने का अंतिम साधन है, लेकिन इसका अनियंत्रित उपयोग न्यायिक सक्रियता की सीमाओं को धुंधला कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस शक्ति का उपयोग बड़े मामलों में किया है, जैसे भोपाल गैस त्रासदी का निपटारा, अयोध्या विवाद में भूमि का आवंटन, और ए.जी. परारिवलन की रिहाई। IIM अहमदाबाद के एक अध्ययन के अनुसार, 1950 से 2023 के बीच अनुच्छेद 142 का 791 बार प्रत्यक्ष रूप से उपयोग किया गया है।
Frequently Asked Questions
1. क्या अनुच्छेद 142 कानून के ऊपर है?
नहीं, 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' मामले में स्पष्ट किया गया है कि यह कानून का पूरक हो सकता है, लेकिन मौजूदा वैधानिक ढांचे को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकता।
2. CJP मामले में विवाद का मुख्य कारण क्या है?
विवाद यह है कि न्यायालय ने व्यक्तिगत FIR की जांच किए बिना, एक समझौते के तहत सामूहिक रूप से मामलों को रद्द कर दिया, जो सामान्य कानूनी प्रक्रिया (BNSS की धारा 528) से अलग है।