हैदराबाद की एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर को बीमा पॉलिसी के नाम पर गुमराह करने के मामले में उपभोक्ता फोरम ने बड़ी राहत दी है। अदालत ने बीमा कंपनी और बैंक को 10 लाख रुपये रिफंड और मुआवजे का आदेश दिया है।
- उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी को 10 लाख रुपये रिफंड करने का निर्देश दिया।
- बैंक और बीमा कंपनी पर 'सेवा में कमी' और 'अनुचित व्यापार व्यवहार' का आरोप लगा।
- प्रोफेसर को 50,000 रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च भी दिए जाएंगे।
हैदराबाद में एक ऐतिहासिक निर्णय में, तेलंगाना उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक 73 वर्षीय सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने एक बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह महिला को निवेश की गई 10 लाख रुपये की पूरी राशि वापस करे। अदालत ने माना कि बीमा पॉलिसी महिला की स्वतंत्र इच्छा और सूचित सहमति के बिना ली गई थी।
धोखाधड़ी का तरीका
मामले के अनुसार, सितंबर 2023 में जब पीड़िता अपने बेटे को पैसे भेजने के लिए बैंक गई थी, तब बैंक अधिकारियों ने उसे दो एजेंटों से मिलवाया। इन एजेंटों ने उसे विश्वास दिलाया कि वह एक ऐसी योजना में निवेश कर रही है जिससे उसे हर साल 2.67 लाख रुपये का रिटर्न मिलेगा। इतना ही नहीं, एजेंटों ने महिला की आय को गलत तरीके से 1 करोड़ रुपये बताया, जबकि वह एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर है जिसकी मासिक पेंशन मात्र 57,000 रुपये है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि बैंक अधिकारियों ने उसे गुमराह किया और ऋण संबंधी कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर तुरंत बीमा में निवेश कर दिया। उन्होंने इसे एकमुश्त निवेश बताया, जबकि वास्तव में यह एक वार्षिक भुगतान वाली योजना थी।
फ्री-लुक पीरियड और पारदर्शिता का अभाव
आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी दस्तावेज महिला के स्थायी पते पर भेजे थे, जबकि वह उस समय विदेश में थी। इस कारण वह 'फ्री-लुक पीरियड' (वह समय सीमा जिसमें पॉलिसी रद्द की जा सकती है) का उपयोग नहीं कर सकी।
आयोग ने स्पष्ट किया कि एक वरिष्ठ नागरिक से ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है, जिसे बैंक और बीमा कंपनी ने विफल कर दिया।
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि वित्तीय संस्थानों द्वारा वरिष्ठ नागरिकों की कम जानकारी का लाभ उठाना एक गंभीर समस्या है। आयोग ने बैंक और बीमा कंपनी दोनों को 'सेवा में कमी' का दोषी पाया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत, 'फ्री-लुक पीरियड' एक महत्वपूर्ण अधिकार है। यह ग्राहकों को पॉलिसी की शर्तों को समझने और यदि वे संतुष्ट नहीं हैं, तो बिना किसी भारी नुकसान के पॉलिसी रद्द करने की अनुमति देता है। इस मामले में, पते की गलत जानकारी ने इस अधिकार को छीन लिया।
Frequently Asked Questions
1. 'फ्री-लुक पीरियड' क्या है?
यह पॉलिसी खरीदने के बाद मिलने वाला 10-15 दिनों का समय होता है जिसमें ग्राहक पॉलिसी की शर्तों से असंतुष्ट होने पर उसे रद्द कर सकता है।
2. क्या बैंक बीमा पॉलिसी के लिए जिम्मेदार हैं?
हाँ, यदि बैंक के कर्मचारी धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर पॉलिसी बेचते हैं, तो बैंक को भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।