सुप्रीम कोर्ट ने मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) को अपराध घोषित करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख तय करने से पहले केंद्र सरकार के रुख का इंतजार करने का निर्णय लिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जaising ने नवंबर में सुनवाई की मांग की है।
- सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के जवाब का इंतजार करेगा।
- वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जaising ने नवंबर में सुनवाई की मांग की।
- मैरिटल रेप को अपराध बनाने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत भी यह अपवाद बरकरार है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर, 2026) को स्पष्ट किया कि वह मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) के अपराधीकरण से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के लिए उपयुक्त तारीख तय करने से पहले केंद्र सरकार के रुख का इंतजार करेगा। यह मामला देश में महिलाओं के अधिकारों और कानूनी समानता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मामले की सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जaising ने मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष याचिका दायर की। उन्होंने मांग की कि इन याचिकाओं को नवंबर में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। जaising ने अदालत को बताया कि हालांकि मामले बुधवार (9 सितंबर) को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं, लेकिन केंद्र ने अभी तक कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया है और पक्षों के बीच याचिकाओं का आदान-प्रदान भी नहीं हुआ है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला न केवल कानूनी व्याख्या का है, बल्कि यह भारतीय समाज में विवाह की संस्था और व्यक्तिगत स्वायत्तता के बीच के संघर्ष को भी दर्शाता है। वर्तमान में, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद के तहत, यदि पत्नी वयस्क है, तो पति द्वारा उसके साथ किया गया यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है।
मैरिटल रेप के खिलाफ कानूनी लड़ाई केवल कानून बदलने के बारे में नहीं है, बल्कि यह विवाह के भीतर सहमति के अधिकार को मान्यता देने के बारे में है।
कानूनी पेच काफी गहरा है। 1 जुलाई, 2024 से लागू हुए नए कानूनों (BNS, BNSS, और BSA) ने पुराने IPC की जगह ले ली है, लेकिन मैरिटल रेप से संबंधित अपवाद अभी भी मौजूद है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह विवाहित महिलाओं को सुरक्षा के अधिकार से वंचित करता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और कानूनी संघर्ष
इस कानूनी लड़ाई की जड़ें बहुत गहरी हैं। 162 साल पहले जब IPC लागू हुआ था, तब से यह अपवाद बना हुआ है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक विभाजित निर्णय (Split Verdict) दिया था। न्यायमूर्ति राजीव शाकधर ने इसे असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि यह दुखद है कि एक विवाहित महिला को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इसे तर्कसंगत माना था।
| कानून का नाम | पुराना प्रावधान (IPC) | नया प्रावधान (BNS) |
|---|---|---|
| बलात्कार कानून | धारा 375 (अपवाद 2) | धारा 63 (अपवाद 2) |
| स्थिति | निरस्त | लागू |
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी पूर्व में कहा था कि पति को इस मामले में छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि क्या वह इस सदियों पुराने अपवाद को समाप्त करेगा या नहीं।
Frequently Asked Questions
1. क्या वर्तमान में भारत में मैरिटल रेप अपराध है?
नहीं, वर्तमान कानून (BNS) के तहत, यदि पत्नी वयस्क है, तो पति द्वारा किया गया जबरन यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता है।
2. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या कर सकता है?
सुप्रीम कोर्ट इस अपवाद की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकता है और इसे असंवैधानिक घोषित कर कानून में बदलाव का निर्देश दे सकता है।