केरल उपभोक्ता आयोग ने एक कूरियर कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार प्रथाओं का दोषी पाया है। एक पिता को अपनी 1.5 साल की बेटी के लिए ऑर्डर किए गए डायपर न मिलने पर 22,500 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है।

  • कूरियर कंपनी को मानसिक उत्पीड़न और कानूनी खर्च के लिए 22,500 रुपये देने का आदेश।
  • आयोग ने स्पष्ट किया कि बिना प्रमाण के पार्सल को 'ग्राहक द्वारा अस्वीकृत' मार्क करना गलत है।
  • ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को इस मामले में जिम्मेदार नहीं माना गया क्योंकि डिलीवरी तीसरे पक्ष द्वारा की जा रही थी।

पथनमथिट्टा जिला उपभोक्ता आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ग्राहक सेवा में घोर लापरवाही बरतने वाली एक कूरियर कंपनी को फटकार लगाई है। मामला मार्च 2025 का है, जब एक व्यक्ति ने अपनी डेढ़ साल की बेटी के लिए 1,429 रुपये के डायपर ऑनलाइन ऑर्डर किए थे। पार्सल समय पर डिलीवरी हब तक पहुँच गया था, लेकिन ग्राहक तक कभी नहीं पहुँचा।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उसे 'आउट फॉर डिलीवरी' का संदेश मिला, लेकिन संबंधित डिलीवरी एजेंट ने दावा किया कि वह उस रूट पर तैनात नहीं है। बार-बार शिकायत करने और नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन से संपर्क करने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। अंततः, ग्राहक की सहमति के बिना ऑर्डर रद्द कर दिया गया और रिफंड प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। अक्सर कूरियर कंपनियाँ अपनी विफलता को छिपाने के लिए 'Customer Refused' (ग्राहक ने मना किया) जैसे झूठे स्टेटस अपडेट का उपयोग करती हैं। यह फैसला अन्य कंपनियों के लिए एक चेतावनी है कि वे अपने आंतरिक सिस्टम और डेटा रिकॉर्डिंग में सुधार करें।

उपभोक्ता संरक्षण कानून अब केवल रिफंड तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजे का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

कूरियर कंपनी ने तर्क दिया कि ग्राहक ने ओटीपी (OTP) प्रदान नहीं किया, जिसके कारण डिलीवरी पूरी नहीं हो सकी। हालांकि, आयोग ने इस तर्क को खारिज कर दिया और माना कि आवश्यक घरेलू उत्पादों की डिलीवरी में देरी और विरोधाभासी स्टेटस अपडेट ने ग्राहक को गंभीर मानसिक परेशानी पहुँचाई है।

आयोग के अध्यक्ष जॉर्ज बेबी और सदस्य निशाद थंकप्पन ने आदेश दिया कि कंपनी 15,000 रुपये मानसिक पीड़ा के लिए और 7,500 रुपये कानूनी खर्च के रूप में भुगतान करे। यदि 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो इस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।

क्या आप जानते हैं?: भारत में उपभोक्ता अपनी शिकायतों के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन नंबर 1915 पर कॉल कर सकते हैं, जो कई राज्यों में त्वरित समाधान प्रदान करता है।

प्रश्न 1: क्या ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता था?
नहीं, इस मामले में आयोग ने पाया कि रिटेल बिजनेस एक अलग कंपनी द्वारा संचालित था, इसलिए प्लेटफॉर्म प्रदाता को जिम्मेदार नहीं माना गया।

प्रश्न 2: उपभोक्ता आयोग ने कूरियर कंपनी को क्या निर्देश दिए?
आयोग ने निर्देश दिया कि पार्सल को तब तक 'अस्वीकृत' मार्क न किया जाए जब तक कि वास्तविक डिलीवरी प्रयास का लिखित प्रमाण न हो।