गुजरात उच्च न्यायालय ने स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू की अस्थायी जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट से मिली पैरोल के आधार पर रिहाई की मांग की थी।
- गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम बापू की 20 दिनों की अस्थायी जमानत याचिका खारिज की।
- यह याचिका राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दी गई पैरोल के आधार पर दायर की गई थी।
- राज्य सरकार ने तर्क दिया कि जमानत के लिए कोई स्वतंत्र आधार पेश नहीं किया गया।
- अदालत ने आसाराम के स्वास्थ्य और देखभाल करने वालों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संज्ञान लिया।
स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। गुजरात उच्च न्यायालय ने उनकी अस्थायी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया है। आसाराम, जो 2013 के एक बलात्कार मामले में गांधीनगर कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं, ने राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा दी गई पैरोल को आधार बनाकर 20 दिनों की रिहाई मांगी थी।
आसाराम के वकील ने तर्क दिया कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने उनकी उम्र और इस बात को ध्यान में रखते हुए पैरोल दी थी कि उन्होंने उस मामले में 13 साल से अधिक समय जेल में बिताया है। वकील ने यह भी कहा कि राजस्थान कोर्ट ने अधिकारियों की आशंकाओं को "कल्पना" बताकर खारिज कर दिया था। इसके बाद जब उन्होंने गुजरात अधिकारियों के पास पैरोल के लिए आवेदन किया, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत में अलग-अलग राज्यों के न्यायिक अधिकार क्षेत्रों के बीच की सख्त सीमा को दर्शाता है। गुजरात हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि एक राज्य की अदालत द्वारा दी गई पैरोल, दूसरे राज्य में रिहाई का स्वचालित अधिकार नहीं देती, खासकर तब जब अपराध की गंभीरता समान हो। यह इस सिद्धांत को पुख्ता करता है कि अदालत की विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग केवल स्वतंत्र और मामले से जुड़े ठोस आधारों पर ही किया जा सकता है।
राज्य सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकारी वकील हार्दिक दवे ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता बिना किसी स्वतंत्र आधार के अदालत से विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग करने की मांग कर रहे हैं। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आसाराम ने उन आधारों का खुलासा नहीं किया जिनके आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने पैरोल दी थी, जो कि गुजरात हाईकोर्ट के लिए निर्णय लेने हेतु अत्यंत आवश्यक था।
'स्वतंत्र आधार' पर न्यायिक जोर इस कानूनी खामी को रोकता है जहाँ एक राज्य के उदार आदेश का उपयोग दूसरे राज्य में सख्त जांच से बचने के लिए किया जा सके।
अदालत ने 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश का भी उल्लेख किया, जो AIIMS जोधपुर की रिपोर्ट पर आधारित था। रिपोर्ट में कहा गया था कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन्हें प्रशिक्षित देखभाल करने वालों (caregivers) की चौबीसों घंटे सहायता की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपनी पसंद का केयरगिवर रखने की अनुमति दी थी, लेकिन सजा के निलंबन की अर्जी लंबित रखी थी।
अंततः, जस्टिस गीता गोपी और जस्टिस एल एस पिर्जादा ने फैसला सुनाया कि इस स्तर पर याचिका स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि आसाराम के स्वास्थ्य में और गिरावट आती है, तो वह पुनः सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम की जमानत याचिका क्यों खारिज की?
अदालत ने पाया कि आसाराम ने अस्थायी जमानत के लिए कोई स्वतंत्र आधार पेश नहीं किया और केवल दूसरे राज्य की अदालत के पैरोल आदेश पर भरोसा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS जोधपुर की रिपोर्ट के बाद उन्हें जेल में पूर्णकालिक केयरगिवर रखने की अनुमति दी, क्योंकि उन्हें सहायता की जरूरत थी लेकिन अस्पताल में भर्ती होने की नहीं।