दिल्ली उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें मेटा, गूगल और एक्स जैसी कंपनियों पर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले 'एडिक्टिव डिजाइन' का आरोप लगाया गया है।

  • मेटा, गूगल, टेलीग्राम, एक्स और स्नैपचैट के खिलाफ एडिक्टिव डिजाइन के लिए PIL दायर।
  • 'इनफिनिट स्क्रॉल' और 'ऑटोप्ले' जैसे फीचर्स को जानबूझकर बनाया गया हथियार बताया गया।
  • भारतीय युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग।
  • विधायिका द्वारा कानून बनाने तक अदालत से दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध।

दिल्ली उच्च न्यायालय में एक कानून विश्वविद्यालय के प्रोफेसर द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) ने डिजिटल दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि उपयोगकर्ता, विशेष रूप से युवा, इनके प्रति आकर्षित और आदी हो जाएं। इस याचिका में मेटा, गूगल, टेलीग्राम, एक्स और स्नैपचैट से मुआवजे की मांग की गई है।

यह मामला मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के सामने आने की संभावना है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि मुद्दा केवल इस बात का नहीं है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर क्या सामग्री (कंटेंट) है, बल्कि यह है कि इनका 'आर्किटेक्चर' कैसा है। 'इनफिनिट स्क्रॉल' (अनंत स्क्रॉल), 'ऑटोप्ले' और एल्गोरिदम द्वारा क्यूरेट किए गए फीड्स का उपयोग उपयोगकर्ताओं का ध्यान खींचने और उन्हें लंबे समय तक बांधे रखने के लिए किया जाता है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला कानूनी जवाबदेही के दायरे को बढ़ाता है। अब तक के कानूनी विवाद कंटेंट या प्राइवेसी पर केंद्रित थे, लेकिन यह याचिका UX/UI डिजाइन के न्यूरोलॉजिकल प्रभाव को चुनौती देती है। यदि अदालत इसे स्वीकार करती है, तो कंपनियों को अपने ऐप के बुनियादी ढांचे को बदलना होगा, जिससे उनके विज्ञापन राजस्व पर सीधा असर पड़ेगा।

सामग्री-आधारित विनियमन से हटकर आर्किटेक्चर-आधारित विनियमन की ओर बढ़ना डिजिटल अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य न्यायशास्त्र में एक नए युग की शुरुआत है।

याचिका में भारतीय संदर्भ में गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। आंकड़ों के अनुसार, 18-24 वर्ष के भारतीय युवा प्रतिदिन 120 मिनट से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह चिकित्सकीय रूप से सिद्ध हो चुका है कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने का सीधा संबंध किशोरों में अवसाद (डिप्रेशन) और आत्महत्या की प्रवृत्तियों से है।

याचिका में अदालत से मांग की गई है कि वह इन 'एंगेजमेंट मैक्सिमाइजिंग' फीचर्स को प्रतिबंधित या विनियमित करे और जब तक संसद इस पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक सख्त दिशा-निर्देश जारी करे। साथ ही, उन बच्चों और युवाओं के लिए मुआवजे की मांग की गई है जिन्होंने इस लत के कारण मानसिक क्षति झेली है।

एडिक्टिव फीचर मनोवैज्ञानिक प्रभाव उपयोगकर्ता पर असर
इनफिनिट स्क्रॉल रुकने के संकेतों का अभाव अनियंत्रित उपयोग
लाइक्स/नोटिफिकेशन डोपामाइन स्पाइक्स मान्यता की निर्भरता
एल्गोरिदम फीड पुष्टि पूर्वाग्रह (Confirmation Bias) मानसिक अलगाव

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक रूप से, सोशल मीडिया कंपनियों ने अपने फीचर्स को 'उपयोगकर्ता की सुविधा' के रूप में पेश किया है। हालांकि, 'अटेंशन इकोनॉमी' (ध्यान अर्थव्यवस्था) के शोध से पता चला है कि कंपनियां 'डार्क पैटर्न्स' का उपयोग करती हैं ताकि उपयोगकर्ता अधिक समय तक ऑनलाइन रहें और अधिक विज्ञापन देखें। अमेरिका और यूरोपीय संघ में भी इसी तरह के कदम उठाए गए हैं, जहाँ नाबालिगों के लिए 'एज-एप्रोप्रिएट डिजाइन कोड' लागू करने की कोशिश की जा रही है।

क्या आप जानते हैं?: 'इनफिनिट स्क्रॉल' को इसलिए बनाया गया था ताकि उपयोगकर्ता को 'अगले पेज' पर जाने के लिए क्लिक न करना पड़े, जिससे मस्तिष्क समय का आभास खो देता है और वह अंतहीन लूप में फंस जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: इस याचिका में किन कंपनियों को नामजद किया गया है?
याचिका में मेटा, गूगल, टेलीग्राम, एक्स और स्नैपचैट को नामजद किया गया है।

प्रश्न 2: किन विशिष्ट फीचर्स को चुनौती दी गई है?
मुख्य रूप से इनफिनिट स्क्रॉल, ऑटोप्ले, एल्गोरिदम आधारित फीड और निरंतर नोटिफिकेशन सिस्टम को चुनौती दी गई है।