गुजरात उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए दो पुलिसकर्मियों को 27 साल बाद बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और स्वीकृति को साबित करने में विफल रहा।
- गुजरात हाईकोर्ट ने 27 साल पुराने रिश्वत मामले में दो पुलिसकर्मियों को बरी किया।
- यह मामला 1999 में एक ऑटो-रिक्शा दुर्घटना और ₹100 के बकाया रिश्वत से जुड़ा था।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल 'tainted' नोटों की बरामदगी सजा के लिए पर्याप्त नहीं है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में दो पुलिसकर्मियों को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया है। यह मामला लगभग तीन दशकों पुराना है, जिसमें एक निचली अदालत ने 2005 में उन्हें दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति विमल के व्यास ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष इस बुनियादी सवाल का जवाब देने में विफल रहा कि क्या वास्तव में रिश्वत की मांग की गई थी और क्या उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया गया था।
मामले की जड़ें जनवरी 1999 में गुजरात के पाटन जिले में हुई एक ऑटो-रिक्शा दुर्घटना से जुड़ी हैं। आरोप था कि सहायक उप निरीक्षक दयाशंकर त्रिपाठी ने ऑटो चालक भानुप्रसाद ओझा से दस्तावेज़ों के बदले ₹1500 की रिश्वत मांगी थी। बातचीत के बाद यह राशि ₹900 तय हुई, जिसमें से ₹800 मौके पर दिए गए और ₹100 बाद में देने का वादा किया गया।
अगले दिन, जब पुलिसकर्मी ने शेष ₹100 की मांग की, तो ओझा ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से संपर्क किया। ACB ने एक जाल बिछाया और 'एंथ्रासीन पाउडर' (एक फ्लोरोसेंट केमिकल) से रंगे नोटों का उपयोग करके पुलिसकर्मियों को रंगे हाथ पकड़ने का दावा किया। इसी आधार पर पाटन की विशेष अदालत ने 2005 में उन्हें दोषी ठहराया था।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में 'सबूतों की विश्वसनीयता' और 'न्यायिक देरी' के गंभीर मुद्दे को उजागर करता है। जब मुख्य गवाह अदालत में अपने ही बयानों से पलट जाता है, तो पूरा केस ढह जाता है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून केवल बरामदगी (recovery) पर नहीं, बल्कि मांग (demand) और स्वीकृति (acceptance) के ठोस प्रमाणों पर चलता है।
"भ्रष्टाचार के मामलों में केवल रंगे हुए नोटों का मिलना पर्याप्त नहीं है; अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने वास्तव में पैसे की मांग की थी।"
हाईकोर्ट के दौरान, मुख्य गवाह भानुप्रसाद ओझा के बयानों में भारी विरोधाभास पाया गया। ओझा ने स्वीकार किया कि जिस अधिकारी ने रिश्वत मांगी थी, वह जाल बिछाए जाने के समय वहां मौजूद नहीं था। उसने यह भी माना कि पहले आरोपी ने न तो कोई मांग की थी और न ही पैसे लिए थे।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि सबूत दो समान रूप से संभावित दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, तो वह दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में हो। इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने निचली अदालत की सजा को रद्द कर दिया और पुलिसकर्मियों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: इस मामले में हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मियों को बरी क्यों किया?
उत्तर: क्योंकि मुख्य गवाह के बयानों में विरोधाभास था और अभियोजन पक्ष रिश्वत की 'मांग' और 'स्वीकृति' को साबित नहीं कर पाया।
प्रश्न 2: इस केस की समयसीमा क्या थी?
उत्तर: घटना 1999 की थी, सजा 2005 में हुई और अंततः 27 साल बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया।