कलकत्ता उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि तलाक की डिक्री पति को उसकी पूर्व पत्नी के भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती है, बशर्ते पत्नी ने पुनर्विवाह न किया हो।

  • तलाक के बाद भी पति की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करे।
  • 'पत्नी' की परिभाषा में वह महिला भी शामिल है जिसे तलाक दे दिया गया हो लेकिन उसने दूसरी शादी न की हो।
  • वयस्क बेटी के लिए गुजारा भत्ता केवल शारीरिक या मानसिक अक्षमता की स्थिति में ही मान्य है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक हालिया फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि विवाह का अंत अनिवार्य रूप से पति के अपनी पूर्व पत्नी को सहायता प्रदान करने के कर्तव्य को समाप्त नहीं करता है। न्यायालय ने एक महिला के लिए निर्धारित 1,500 रुपये के मासिक भरण-पोषण (Maintenance) को बरकरार रखा, जबकि उनकी बेटी के लिए आवंटित राशि को खारिज कर दिया।

यह मामला 2019 से चल रहा था, जब एक ट्रायल कोर्ट ने कुल 3,500 रुपये प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता तय किया था, जिसमें से 1,500 रुपये पत्नी के लिए और 2,000 रुपये बेटी के लिए थे। पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि 2022 में मिली तलाक की डिक्री के बाद भरण-पोषण की कार्यवाही समाप्त हो जानी चाहिए।

कानूनी व्याख्या और न्यायालय का रुख

जस्टिस उदय कुमार ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि विधायी मंशा बिल्कुल स्पष्ट है। न्यायालय के अनुसार, विवाह का विच्छेद, चाहे वह पति द्वारा प्राप्त डिक्री के माध्यम से ही क्यों न हो, उसकी वैधानिक बाध्यता को स्वतः समाप्त नहीं करता है। यदि पत्नी अविवाहित है और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो वह सहायता की हकदार है।

तलाक वैवाहिक संबंधों को समाप्त करता है, लेकिन यह उन सामाजिक और कानूनी सुरक्षा नेट को नष्ट नहीं करता जो एक महिला को निराश्रित होने से बचाते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह निर्णय भारत में पारिवारिक कानूनों के प्रति एक प्रगतिशील दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि पुरुष केवल कानूनी खामियों या तलाक की डिक्री का उपयोग करके अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए एक मिसाल बनेगा जो तलाक के बाद आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं।

मामले के ऐतिहासिक विवरणों पर गौर करें तो, इस जोड़े ने 1995 में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। समय के साथ उनके रिश्तों में कड़वाहट आई, जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक शोषण और संपत्ति विवादों से जुड़े कई आपराधिक और दीवानी मामले दर्ज हुए।

बेटी के भरण-पोषण पर फैसला

न्यायालय ने बेटी के लिए निर्धारित 2,000 रुपये के भरण-पोषण को रद्द कर दिया क्योंकि वह अक्टूबर 2017 में ही वयस्क (Major) हो चुकी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक वयस्क बच्चा केवल तभी भरण-पोषण का दावा कर सकता है जब वह किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता के कारण स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।

श्रेणी ट्रायल कोर्ट का आदेश (2019) हाई कोर्ट का निर्णय (2026)
पत्नी का गुजारा भत्ता 1,500 रुपये/माह बरकरार रखा गया
बेटी का गुजारा भत्ता 2,000 रुपये/माह रद्द कर दिया गया
कुल राशि 3,500 रुपये/माह 1,500 रुपये/माह
क्या आप जानते हैं?: हिंदू विवाह अधिनियम के तहत, 'पत्नी' शब्द की कानूनी व्याख्या में वह महिला भी शामिल है जिसे तलाक दिया गया है, बशर्ते उसने पुनर्विवाह न किया हो।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या तलाक के बाद भी गुजारा भत्ता देना अनिवार्य है?
हाँ, यदि पत्नी पुनर्विवाह नहीं करती है और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।

प्रश्न 2: वयस्क बच्चों को गुजारा भत्ता कब मिलता है?
एक वयस्क बच्चा केवल तभी गुजारा भत्ता का दावा कर सकता है जब वह किसी गंभीर शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण आत्मनिर्भर न हो सके।