बेंगलुरु पुलिस ने एक उम्रकैद convict और जेल अधिकारी को गिरफ्तार किया है, जिन्होंने 2018 में एक फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश का उपयोग करके अवैध रूप से रिहाई सुनिश्चित की थी।

  • उम्रकैद convict शंकर ए आराध्या को 2018 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल से अवैध रूप से रिहा किया गया था।
  • जेल कर्मी श्रीकांत एस ने कथित तौर पर रिश्वत के बदले सुप्रीम कोर्ट का फर्जी आदेश तैयार किया।
  • 8 साल बाद एक आंतरिक ऑडिट के दौरान इस धोखाधड़ी का खुलासा हुआ।

बेंगलुरु पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए उम्रकैद convict शंकर ए आराध्या और जेल कर्मचारी श्रीकांत एस को गिरफ्तार किया है। इन दोनों पर आरोप है कि उन्होंने एक सोची-समझी साजिश के तहत सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश का इस्तेमाल किया, जिससे आराध्या पिछले आठ वर्षों से खुलेआम घूम रहा था।

यह मामला 2001 के एक फिरौती के लिए अपहरण के केस से जुड़ा है, जिसमें आराध्या को 2004 में फास्ट ट्रैक कोर्ट-I द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। कर्नाटक उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, पैरोल के दौरान आराध्या की पत्नी की मुलाकात जेल के 'convict सेक्शन' में कार्यरत द्वितीय श्रेणी सहायक श्रीकांत एस से हुई।

धोखाधड़ी का तरीका

पुलिस जांच के अनुसार, श्रीकांत एस ने आराध्या की रिहाई के बदले 12 लाख रुपये की मांग की थी। आराध्या के परिवार ने 6 लाख रुपये का भुगतान किया, जिसके बाद श्रीकांत ने 2 नवंबर 2018 की तारीख का एक फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश तैयार किया। इस दस्तावेज़ में यह दिखाया गया कि शीर्ष अदालत ने आराध्या की रिहाई का निर्देश दिया है। इसी फर्जी कागज़ के आधार पर 13 नवंबर 2018 को उसे जेल से रिहा कर दिया गया।

"उम्रकैद के कैदी को रिहा करने से पहले आधिकारिक माध्यमों से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सत्यापन न करना, जेल प्रशासन की एक गंभीर और आपराधिक लापरवाही है।"

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह घटना भारतीय जेलों की मैन्युअल सत्यापन प्रक्रियाओं में मौजूद गंभीर खामियों को उजागर करती है। एक उम्रकैद convict का आठ साल तक बिना किसी संदेह के बाहर रहना यह दर्शाता है कि न्यायिक और प्रशासनिक विभागों के बीच तालमेल का भारी अभाव है।

अब इस जांच का दायरा बढ़ गया है। आराध्या की पत्नी ने पूछताछ में जेल के पूर्व मुख्य अधीक्षक की भूमिका का भी जिक्र किया है, जिससे संकेत मिलता है कि यह केवल एक क्लर्क की साजिश नहीं बल्कि जेल प्रशासन के भीतर एक बड़े सिंडिकेट का काम था। पुलिस अब 2018 में रिहाई की प्रक्रिया में शामिल सभी अधिकारियों की जांच कर रही है।

क्या आप जानते हैं?: जेल का 'convict सेक्शन' कैदियों की रिहाई की तारीख तय करने और वारंट के सत्यापन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जिससे यह भ्रष्टाचार के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र बन जाता है।
विवरणवास्तविक स्थितिफर्जी दावा
अदालती आदेशसजा बरकराररिहाई का निर्देश
रिहाई की तारीखउम्रकैद13 नवंबर, 2018
सत्यापनफर्जी (SC द्वारा पुष्टि)असली SC आदेश

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: इस धोखाधड़ी का पता अंततः कैसे चला?
रिहाई के दस्तावेजों के आंतरिक सत्यापन के दौरान संदेह हुआ, जिसके बाद कागजात सुप्रीम कोर्ट के सहायक रजिस्ट्रार को भेजे गए, जिन्होंने इसे फर्जी बताया।

प्रश्न 2: आरोपियों पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
आरोपियों पर जालसाजी (forgery), धोखाधड़ी और भारतीय दंड संहिता (IPC) की अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।