X कॉर्प ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार ने गुजरात उच्च न्यायालय से महत्वपूर्ण तथ्य छुपाए ताकि प्लेटफॉर्म को 'सहयोग' पोर्टल से जुड़ने के लिए मजबूर किया जा सके। अब यह कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है।
- X कॉर्प का दावा है कि गृह मंत्रालय (MHA) ने गुजरात हाईकोर्ट से तथ्य छुपाए ताकि 'सहयोग' पोर्टल को अनिवार्य बनाया जा सके।
- प्लेटफॉर्म ने दावा किया कि उसने धारा 69A के तहत सभी ब्लॉकिंग ऑर्डर्स का 100% पालन किया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।
एक गंभीर कानूनी विवाद में, एलोन मस्क की X कॉर्प ने गृह मंत्रालय (MHA) पर तीखा हमला किया है। कंपनी का आरोप है कि भारत सरकार "बैकडोर" (पिछले दरवाजे) के जरिए अदालत से ऐसा आदेश प्राप्त करना चाहती है जिससे X को सरकार के कंटेंट-टेकडाउन पोर्टल 'सहयोग' (Sahyog) से जुड़ने के लिए मजबूर किया जा सके। गौरतलब है कि X पहले से ही अन्य भारतीय अदालतों में इस पोर्टल की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे रहा है।
यह विवाद तब गहरा गया जब X ने गुजरात उच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर किया। केंद्र सरकार ने अप्रैल में दावा किया था कि X कानूनी कंटेंट-ब्लॉकिंग निर्देशों का पालन करने में विफल रहा है। X कॉर्प ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत आने वाले सभी ब्लॉकिंग ऑर्डर्स का पालन कुछ ही घंटों के भीतर करता है।
डेटा की जंग: अनुपालन बनाम आरोप
अपने दावों को पुख्ता करने के लिए X ने आंकड़े पेश किए। कंपनी के अनुसार, अप्रैल और मई 2025 के बीच उसे धारा 69A के तहत 62 से अधिक आपातकालीन ब्लॉकिंग ऑर्डर मिले, जिनमें 1,800 URL शामिल थे, और उसने उन सभी का पालन किया। X का तर्क है कि सरकार धारा 79(3)(b) के तहत भेजे गए 'अनुरोधों' को धारा 69A के 'अनिवार्य आदेशों' के साथ मिला रही है, जो कि कानूनी रूप से गलत है।
| विशेषता | धारा 69A आदेश | धारा 79(3)(b) नोटिस |
|---|---|---|
| प्रकृति | वैधानिक ब्लॉकिंग आदेश | हटाने का अनुरोध/सूचना |
| कानूनी वजन | अनिवार्य अनुपालन | कार्यवाही के लिए अनुरोध |
| X कॉर्प का रुख | 100% अनुपालन | विवेकपूर्ण/मामले के आधार पर |
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह केवल एक पोर्टल का तकनीकी विवाद नहीं है, बल्कि राज्य की संप्रभुता और कॉर्पोरेट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच का टकराव है। सरकार 'सहयोग' पोर्टल के माध्यम से सेंसरशिप की एक केंद्रीकृत प्रणाली चाहती है, जबकि X इसे एक "गुप्त" उपकरण मानता है जो स्थापित कानूनी सुरक्षा उपायों को दरकिनार करता है। X का कहना है कि उसके पास पहले से ही LEGOS नामक कानूनी अनुरोध प्रणाली मौजूद है।
धारा 69A के आदेशों और 'सहयोग' जैसे केंद्रीकृत पोर्टल की प्रशासनिक इच्छा के बीच का तनाव भारत में डिजिटल न्यायशास्त्र की नई सीमा को दर्शाता है।
इस कानूनी लड़ाई में नया मोड़ 8 सितंबर को आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र की ट्रांसफर याचिका पर नोटिस जारी किया और गुजरात हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। अब यह तय होना बाकी है कि इस मामले की सुनवाई किस अदालत में होगी।
X कॉर्प ने यह भी तर्क दिया कि सरकार द्वारा हटाए जाने वाले अधिकांश URL राजनीतिक दलों और समसामयिक विषयों से संबंधित थे, जो "गैर-कानूनी कंटेंट" की श्रेणी में नहीं आते। इसमें AI-जनरेटेड दुष्प्रचार पर भी विवाद है, जहाँ सरकार का दावा है कि 90% हानिकारक कंटेंट कृत्रिम रूप से बनाया गया था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सहयोग पोर्टल क्या है?
यह सरकार द्वारा विकसित एक पोर्टल है जिसका उद्देश्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजे जाने वाले कंटेंट हटाने के अनुरोधों को सरल बनाना है।
X कॉर्प इस पोर्टल का विरोध क्यों कर रहा है?
X का तर्क है कि यह पोर्टल IT एक्ट या 2021 के नियमों के तहत अनिवार्य नहीं है और उसके पास पहले से ही LEGOS नामक एक प्रभावी प्रणाली है।